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मै खुद ख़ुशी कर लूगा..

मै खुद ख़ुशी कर लूगा॥ नौकरी छूटी..बीबी रूठी॥ किस्मत भी फूटी॥ लय भी टूटी॥ मै जान दे दूगा... मै खुद ख़ुशी कर लूगा॥ गम लगे सताने सब लगे डराने... अगल बगल के मारे ताने॥ मै जहर पी लूगा... क्या कहूगा कहा पाऊगा॥ बच्चो को कपडे॥ कैसे लूगा॥ मै प्राण दे दूगा...

मै भी बिका दहेज़ में॥ ससुर बुलाया है॥

मै भी बिका दहेज़ में॥ ससुर बुलाया है॥ उनकी लड़की बड़ी होशियार है ,, ये भी बताया है... कहने लगे की बेटा ,,अभी कच्ची कली है॥ अप्सराओ से भी सुन्दर हमारी लली है॥ उसके अनेको काम को मुझको दिखाया है॥ मै भी बिका दहेज़ में॥ ससुर बुलाया है॥ बात सुनती नहीं किसी की न सम्मान करती है॥ बेतुकी बात करती हरदम अकड़ती है॥ उसके दिलेरी बात को फिर से सुनाया है॥ मै भी बिका दहेज़ में॥ ससुर बुलाया है॥ पढ़ाई में मन नहीं लगाई तभी तो दसवी पास है... बहुत धन दू गा मै तुमको जो हमारे साथ है॥ अपने सपनों को अपने हाथो से सजाया है॥ मै भी बिका दहेज़ में॥ ससुर बुलाया है॥ मेरे घर वाले सब खुश थे॥ हमें आभास हो रहा था॥ इस चक्कर में मत फसो मेरे कान में कह रहा था॥ लालच में मै भी आके अपने भविष्य को डुबाया॥ मै भी बिका दहेज़ में॥ ससुर बुलाया है॥

मै पुष्प वाटिका की बेटी हूँ..

लड़का: क्यों इतनी दूर खड़ी हो॥ ज़रा नजदीक तो आओ न॥ रूप वती सुन्दर कितनी हो ॥ अपना नाम बताओ न॥ लड़की: मै पुष्प वाटिका की बेटी हूँ॥ लता मुझे सब कहते है॥ १०० गज की दूरी पर॥ मुझसे भवरे रहते है॥ क्यों पहचान हमारी पूछ रहे हो॥ कारण कोई बताओ न॥ लड़का: कल के उस तुफानो में॥ उड़ करके यहाँ आया हूँ॥ बहुत जोर की प्यास लगी है॥ तुम्हे देख अकुलाया हूँ। सोलह सिंगार से सोभित हो तुम॥ अपना हाथ थमाओ न॥ लड़की: तुम मुझपर मोहित हो करके ॥ थोड़ी से गलती कर बैठे॥ मुझको न अपना पाओगे॥ खड़े खड़े यूं ऐसे॥ कल कल झरने कर रहे है॥ उसमे जा नहाओ न॥ लड़का:सब खुशिया मुझे मिल गयी॥ सपने सच होने वाले है॥ तुम्हे छिपा के रख लूगा॥ अभी खाली हमारी बाहे है॥ खड़ी खड़ी क्यों हंस रही॥ मेरी बाहों में आओ न॥ लड़की: वादा करो कभी न दूर रहोगे॥ सेवा करूगी मै जो तुम कहोगे॥ सपने सजाऊगी हंस हंस के तुम्हारा॥ आने वाल कल भी होगा हमारा। खड़े खड़े क्यों हंस रहे हो॥ कलियों पे हाँथ लगाओ न॥

रूप बड़ा मस्ताना है॥

कितनी सुन्दर लगती हो॥ रूप बड़ा मस्ताना है॥ कितने भवरे मंडराते है॥ कितनो का दिल दीवाना है... मानो मणियो संग मोती गिरते॥ रह रह के जब हंसती हो॥ मन दरिया बन जाता है॥ आँखे आश लगाती है॥ होठ ज़रा मुस्काने दो॥ अपनी बात बताती है,,, झुक जाती है लता सखाये॥ रुक रुक के जब चलती हो॥ कान आनंदित हो जाते है॥ जब मधुर स्वरों में गाती हो॥ बादल भी हंसने लगते है॥ जब मुझसे प्रीति लगाती हो॥ तब हवा मगन हो मंगल गाती॥ अंकुर पर ओश जब गिरती है॥ सुख संपत्ति सब हंसने लगते॥ जब हमसे नैन मिलाती हो॥ मन की बात बताने में॥ कभी कभी सकुचाती हो...

पोथी वाला पंडित...

मै पोथी वाला पंडित हूँ॥ जो ज्ञान की बात बताता हूँ॥ जाति पाति का भेद न करता॥ निर्धन के घर खाता हूँ॥ मन में कोई मेल नहीं है॥ कटुक बचन से मेल नहीं॥ अत्याचारी का दुश्मन मै हूँ॥ करता उनसे खेल नहीं॥ समय आने पर डट जाता हूँ॥ विकत रूप दिखलाता हूँ॥ मै पोथी वाला पंडित हूँ॥ जो ज्ञान की बात बताता हूँ॥ जाति पाति का भेद न करता॥ निर्धन के घर खाता हूँ॥ हमें पता है वह काल पुरुष है॥ समयानुसार बताऊगा॥ जब भ्रष्ट करूगा भ्रष्टाचार को॥ तभी सामने आऊगा। सच्चाई की अलख जगाता॥ सच की तिलक लगाता हूँ॥ मै पोथी वाला पंडित हूँ॥ जो ज्ञान की बात बताता हूँ॥ जाति पाति का भेद न करता॥ निर्धन के घर खाता हूँ॥ देश तवाह ये रक्षक करते॥ जो मादक पदार्थ बिकवाते है॥ ये तो कलयुग के ठेकेदार है॥ फ़ोकट में मौज उड़ाते है॥ इनका सर गंजा करवा के॥ कालिख इन्हें लगाऊगा॥ मै पोथी वाला पंडित हूँ॥ जो ज्ञान की बात बताता हूँ॥ जाति पाति का भेद न करता॥ निर्धन के घर खाता हूँ॥

कुवारा लागल मरबय॥

बीत गय जवानी अब आयी बूढाई हो॥ कुवारा लागल मरबय॥कुवारा लागल मरबय॥ जिया उबियाय हो॥ कुवारा लागल मरबय॥ सोलह की उमरिया मा खेले गुल्ली डंडा॥ अखिया गवाय के होय गये अंधा॥ अतिया मा निंदिया करय उपहास हो॥ कुवारा लागल मरबय॥ घर कय गरीब रहिय्ले भइल न eइलाज॥ देशी दवाई कय कीन्हा उपचार॥ दाहिनी आँख आंधर भैले नइखे देखायहो॥ कुवारा लागल मरबय॥ चश्मा पहिन जब चलली सड़किया॥ पीछे से सीटी बजावै लड़किया॥ असली रूप देख के लगे उकिलाय हो॥ कुवारा लागल मरबय॥ मन टूट गइला मनवा अधीर भा ॥ माया मोह छुटट नाही जायी कहा॥ दिन मा दिनौधि होय केहका बतायी हो॥ कुवारा लागल मरबय॥

मै और जा जी,,

मै और झा जी ,,, मै: झा जी॥ झा जी: हां जी॥ मै: किस खेत की मुर्गिया अंडा नहीं देती है॥ झा जी: जिस खेत में मुर्गिया नहीं होती है॥ मै: झा जी॥ झा जी: हां जी॥ मै: ममता दीदी के आते ही रेल गाडी लोगो को क्यों रोज़ ठेल रही है॥ झा जी: क्यों की ममता लालू जैसे नहीं है॥ मै : झा जी॥ झा जी: हां जी॥ मै: हमारे देख में दिनों दिन महगाई क्यों दौड़ी चली आ रही है॥ झा जी: क्यों की भारत में भ्रष्टा चार व्याप्त है॥

क्यों दूर जाती हो...

साकी शराब हाथ ले॥ होठो पे गिरातीहो॥ होता हूँ नशा में जब॥ क्यों दूर जाती हो॥ आँखों के इशारों से पास बुलाती हो॥ कुछ बात नहीं कहती क्यों शर्माती हो॥ फिर दिल को तोड़ देती करीब नहीं आती हो॥ होता हूँ नशा में जब॥ क्यों दूर जाती हो॥ बाते बनाती खूब हो रूप है शलोना॥ मेरा दिल बोलता है तुम कुछ कहो न॥ जगा के यूं उमंगें क्यों भूल जाती हो॥ होता हूँ नशा में जब॥ क्यों दूर जाती हो॥ जब टूटता है दिल तो धुधाता सहारा॥ कोई नहीं दिखाता सामीप न किनारा॥ गम के दिनों में क्यों नज़र आती हो॥ होता हूँ नशा में जब॥ क्यों दूर जाती हो॥ मुझसे तो तो पूछिये हम कैसे जी रहे है॥ साथी समझ शराब को हम पी रहे है॥ तोड़ के वे बंधन क्यों पछता रही हो॥ होता हूँ नशा में जब॥ क्यों दूर जाती हो॥

जब मोर मगन हो करके नाचा..

मै मयूर मगन हो देख रहा था॥ जो उपवन में नाच दिखाता था॥ रिम-झिम रिम-झिम बारिश होती॥ मेढक तान लगाता था॥ संग सहिलिया रास रचाती॥ मोर मगन मुस्काता था॥ उसी समय कोयल की बोली॥ मन मेरा हर्षाती थी॥ अपनी प्रिया के गम में डूबा॥ आँखे आंसू बरसाती थी। मन थोड़ा उदास हुआ था॥ अपनी कमी टटोला था॥ रिम-झिम रिम-झिम बारिश होती॥ मेढक तान लगाता था॥ तभी पवन रस डोली थी॥ कानो में मेरे बोली थी॥ राह निहार रही तेरी जोगन॥ कानो में आभा बोली थी। अन्द्कार अब दूर होगया॥ मन जगा उजाला था॥ रिम-झिम रिम-झिम बारिश होती॥ मेढक तान लगाता था॥

भ्रष्ट मण्डली ..

यह भ्रष्टाचारी की भ्रष्ट मंडली॥ इनकी अक्ल बौडाई है॥ चारो तंगी का आलम॥ इनके कारण ही महगाई है॥ खुल्लम खुल्ला घूंस लेते॥ तनिकव नहीं लजाते है॥ अगर तनिक मुह खुल जाता तो॥ बाजा जस बजाते है॥ इनके लिए तो अच्छा मौसम॥ इनके लिए ठिठाई है॥ पूजे जाते भ्रष्ट घरो में॥ अफसर या चपरासी हो॥ कही सच्चाई नहीं बसी अब॥ काबा हो या काशी हो॥ मेरी कलम गलत नहीं लिखती॥ सोचो कितनी गहराई है॥ ज्यादा दिन अब नहीं है चलना॥ कुछ पल में तेरी बिदाई॥

ये राजनीति की वही है कुर्सी..जो भ्रष्टाचार बुलाती है..

एक कुर्सी मुझे सपने में नज़र आती है॥ बैठने को मन कहता पर आत्मा सकुचाती है॥ ये राजनीति की वही है कुर्सी॥ जो भ्रष्टाचार बुलाती है॥ जो इस कुर्सी पर बैठा सच्चा न कोई उतरा है॥ किसी की चादर साफ़ नहीं है॥ सभी का कुर्ता मैला है॥ खड़े खड़े जनता के हक़ को॥ बीच सभा लुटवाती है॥ ये राजनीति की वही है कुर्सी॥ जो भ्रष्टाचार बुलाती है॥ सम्बन्धी सब मौज उड़ाते॥ गरीब खड़े चिल्लाते है॥ नेता जी तो बड़े निकम्मे ॥ वादा करके भूल जाते है॥ इस कुर्सी के करया बहुत है॥ पर भ्रष्टाचार बदमासी है॥ ये राजनीति की वही है कुर्सी॥जो भ्रष्टाचार बुलाती है॥ इस कुर्सी का मूल्य मंत्र यह॥ सच को कभी मत डिगने दो॥ कडा शाशन कर के रखो॥ बुरी बया मत बहने दो॥ मूक बनी कुर्शी बैठी॥ मन ही मन लजाती है॥ ये राजनीति की वही है कुर्सी॥जो भ्रष्टाचार बुलाती है॥

मै कवि नहीं कल्पित अक्षर हूँ॥

मै कवि नहीं कल्पित अक्षर हूँ॥ जो रच रच शब्द खिलाता हूँ॥ बड़े बड़े विद्धवानो से ॥ समय समय बचवाता हूँ॥ मै वीर नहीं विरला अक्षर हूँ॥ जो स्वर से स्वर मिलाता हूँ॥ बड़े बड़े कलाकारों के संग॥ साथ में ठुमका लगाता हूँ॥ मै फूल नहीं फुलझडिया हूँ॥ जो वाया हाथ मिलाता हूँ॥ भगवन के मन मंदिर में॥ मंगल मय बात बताता हूँ॥

आइये आइये कवि राज़ आइये॥

आइये आइये कवि राज़ आइये॥ सुन्दर सुन्दर अक्षरों से आसमान को सजाइए॥ लेखनी से लेख लिख चाँद को बुलाइए॥ ऐसा शब्दों का सार हो पूर्णिमा विराजे॥ अर्थो का बना हार हो आमवाश्या नाचे॥ नयी नयी बात नवयुग को बतलाइये॥ आइये आइये कवि राज़ आइये॥ सोच में पढ़ जाए दिमाग पढ़ने वाले दिल का॥ भले बड़े बन न पावो बन जाओ तिनका॥ शव्दों के सुनहरे हार को साहित्य को पहनाइए॥ आइये आइये कवि राज़ आइये॥ चर्चा गली में होगी पर्दा खुल जाएगा॥ आयेगा आयेगा अपना भी समय आयेगा॥ फूलो के शब्द हो आरती सजाइये॥ आइये आइये कवि राज़ आइये॥

अपना क्यों बनाया..

मै तो बेदाग़ थी तूने दाग क्यों लगाया॥ जब जाना था दूर मुझसे अपना क्यों बनाया॥ अब तनहईया हमें रह रह के तडपाती है... बीती हुयी वे बाते हमको रूलाती है॥ सूखा चमन पडा था तूने क्यों खिलाया॥ मै तो बेदाग़ थी तूने दाग क्यों लगाया॥ जब जाना था दूर मुझसे अपना क्यों बनाया॥ अब चलती हूँ जब डगर में ताने मारते है॥ मै पहले से थी तुम्हारी सभी जानते है॥ ये होता कैसा यूं प्यार है हमें क्यों दिखाया॥ मै तो बेदाग़ थी तूने दाग क्यों लगाया॥ जब जाना था दूर मुझसे अपना क्यों बनाया॥ आँखों में तुम बसे हो मुझे नींद नहीं आती॥ तेरी राशीली बतिया रात भर जगाती॥ जब करना था घात मुझसे सिन्दूर क्यों लगाया॥ मै तो बेदाग़ थी तूने दाग क्यों लगाया॥ जब जाना था दूर मुझसे अपना क्यों बनाया॥

कडूयी मुहब्बत क्या है..

आया था यहाँ जीने॥ अब लुट के जा रहा हूँ॥ कडुई मुहब्बत क्या है॥ तुमको बता रहा हूँ॥ चंचल स्वभाव मेरा॥ सब का दुलारा था॥ दादा दादी का पोता॥ मम्मी पापा को प्यारा था॥ कैसे चढ़ी जवानी ॥ उसको बता रहा हूँ॥ आया था यहाँ जीने॥ अब लुट के जा रहा हूँ॥ चढ़ते जवानी मुझको॥ एक पारी मिल गयी॥ अपना भविष्य सवारने ॥ की कड़ी खुल गयी॥ कैसे हुआ था लट्टू ॥ तुमको बता रहा हूँ॥ आया था यहाँ जीने॥ अब लुट के जा रहा हूँ॥ सीचा था मेरे तन को॥ अब मुरझा रहा हूँ॥ उसने मुझे हंसाया॥ अब आंसू गिरा रहा हूँ॥ आया था यहाँ जीने॥ अब लुट के जा रहा हूँ॥ मैंने भी कदम पे चढ़ के॥ बंसी बजाया था॥ उसके ही दिल में अपनी॥ प्रीति जगाया था॥ वह मुझसे बिछड़ गयी। जो बीती गा रहा हूँ॥ आया था फ़ोन एकदिन॥ वह माँ बन गयी॥ मुझसे बिछड़ के ॥ किसी दूजे को मिल गयी॥ वह कैसी थी तुम बताओ॥ मै तुम्हे बता रहा हूँ॥

हम पहले के टॉपर है.. फिर से बाज़ी मारेगे..

हम जान लगा देगे॥ पर हिम्मत नाही हारे गे॥ हम पहले के टॉपर है॥ फिर से बाज़ी मारेगे॥ समय समय पर करू पढाई॥ समय का रखता ध्यान॥ यही समय है कुछ बनाने॥ साहब नेता नबाब॥ चढ़ जायेगे शिखा के ऊपर॥ नयी नयी बात निकाले गे॥ हम पहले के टॉपर है॥ फिर से बाज़ी मारेगे॥ अपने माँ के अरमानो का॥ हमें बहुत है ख्याल॥ अगर पैर पीछे हटाता है॥ होगा उन्हें मलाल॥ भारत माँ की धरती पर॥ नयी उपज उपारेगे॥ हम पहले के टॉपर है॥ फिर से बाज़ी मारेगे॥ तब सफलता कदम चूमेगी॥ खुशिया का मौसम आयेगा॥ बन जायेगे महा पुरुष हम॥ कभी समय बतलायेगा॥ अपनी विद्दया के झंडे को॥ एक दिन हम भी गाड़ेगे॥ हम पहले के टॉपर है॥ फिर से बाज़ी मारेगे॥

मेरी मौत बुला रही है..

लगता है मेरी मौत मुझको बुला रही॥ देखो ज़रा गगन में ओ सज के आ रही है॥ मेरी भी अर्थी को तुम लोग भी सजाओ॥ गम में थोड़ा डूब के आंसूओ को बहाओ॥ मेरी करनी कथनी पे ओ मुस्का रही है॥ लगता है मेरी मौत मुझको बुला रही॥ देखो ज़रा गगन में ओ सज के आ रही है॥ मैंने कभी किसी पे दया दृष्ट नहीं डाली॥ मौक़ा मिला हमें जब खाली किया थाली॥ कैसे कर्म थे मेरे अब मुझको बता रही है॥ लगता है मेरी मौत मुझको बुला रही॥ देखो ज़रा गगन में ओ सज के आ रही है॥ सदा किया था घात सूझा हमें उत्पात॥ हमेशा मैंने अपनी दिखया था औकात॥ मेरे ही पाप की बू से बदबू आ रही है॥ लगता है मेरी मौत मुझको बुला रही॥ देखो ज़रा गगन में ओ सज के आ रही है॥
कोमल सा तन है बहुत लजाती॥ पड़ोस वाली लड़की हमें याद आती॥ होठो से हंसी की पहेली बुझाती॥ पड़ोस वाली लड़की हमें याद आती॥ कजरारी आँखे सुरीली है बोली॥ घने घने केश है करते ठिठोली॥ मेरे घर का चक्कर हमेशा लगाती॥ पड़ोस वाली लड़की हमें याद आती॥ नाजुक बदन पर श्वेत रंग का शूट है॥ मुझसे है कहती तुम्हारे लिए छूट है॥ सपनो में मुझको आके जगाती ॥ पड़ोस वाली लड़की हमें याद आती॥ उसकी अदाओं का मै हूँ दीवाना॥ उसके अब सपने हमें है सजाना॥ इशारों पे अपने मुझको नचाती॥ पड़ोस वाली लड़की हमें याद आती॥ कहे कोई कुछ ताना मारे जबाना॥ मैंने अब ठाना है नहीं है डराना॥ मेरे माँ बाप से थोड़ा लजाती है॥ पड़ोस वाली लड़की हमें याद आती॥

हर दिन प्रातः उठ कर वह.. हमें पूजने आता है..

हर दिन प्रातः : : उठ कर के वह॥ मेरे समीप आटा है ॥ अपने नाजुम हाथो से॥वह॥ मेरे पैर दबाता है॥ मै गूंगा बैठा कुछ न बोलू॥ वह अपनी बात बताता है॥ अमृत गंगा के जल से वह॥ रोज़ हमें नहलाता है॥ कितना अद्भुत बालक है वह॥ मेरी ही रट लगाता है॥ कभी कभी वह पूछ बैठता॥ क्या तुम कभी न बोलो गे॥ दादा कहते तुम भोले हो। आज नहीं कल डोलो गे॥ पाने हाथो से पुष्प पान ला॥ मुझपर रोज़ चढ़ाता॥ उस बालक की छाप निराली॥ जो हमें पूजने आता है॥

मै कलुवा पुर का नाई हूँ..

मै गली गली पगडण्डी पर लोगो का बाल बनाता हूँ॥ मै कलुवा पुर का नई हूँ, उंच नीच घर जाता हूँ॥ जहा दान दक्षिणा का मेला देते लोग आशीष है॥ उनकी सेवा में हाज़िर होता मुझको मिलती फीस है॥ जहा में बोली थम जाती है सब उनकी अलख जगाता हूँ॥ मै बोली में बिलकुल माहिर हूँ अच्छो की तेल लगाता हूँ॥ काम को अपने पूज्य समझता चौखट पे हरदम जाता हूँ॥ कभी कभी गुंडों के घर में रस्सी से बांधा जाता हूँ॥ कोई कोई क़द्र न करता मजदूरी नहीं देता॥ मेरी किस्मत में जो धन था उसको छीन भी लेता॥ बड़े नबाबो में घर जा कर ऊचे मूल्य बिकाता हूँ॥