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संवेदनाए शून्य, नैतिकता शर्मसारः एक नजर..

विशेषः इस कलयुगी समाज में सारे रिश्तों का ताना-बाना बिगड़ता ही जा रहा है। कहा जाता था कि लड़कियां खुली तिजोरी के समान होती हैं और घर ही उनके लिए सबसे सुरक्षित जगह है। मगर अब लड़कियां अपने ही घर में महफूज नहीं हैं। आए दिन हम बाप का बेटी से बलात्कार करना, शारीरिक संबंध स्थापित करना व अन्य प्रकार की प्रताड़नाए होने की घटनाओं से रूबरू होते हैं। इस तरह की घटनाएं हमें यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि कल का सभ्य समाज आज किस दिशा में जा रहा है। क्या सभी रिश्तों की सीमाएं टूट गई हैं, संवेदनाएं शून्य हो गई हैं या फिर इंसान अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। इस घोर कलयुग में जहां बाप-बेटी में शारीरिक संबंध स्थापित होने की खबर लगतार बढ़ती ही जा रही है वहीं दूसरी तरफ अब मां का रूप सामने निकलकर आ रहा है। एक मां ने अपने सगे बेटे के प्रति आकर्षित होकर उसे ही शारीरिक संबंध बनाने का प्रस्ताव दे डाला। पिछले कुछ दिनों से प्रकाश में ऐसे-ऐसे मामले आए हैं जिन पर सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आईए डालते हैं कलयुगी मां-बाप के काले कारनामों पर एक नजर... अमीर बनने के लिए बेटियों का शार...

मनु "बे-तक्ख्ल्लुस"जी की अनमोल नज्म

नाम - मनु "बे-तक्ख्ल्लुस" जन्म - २ मार्च १९६७ पता - उत्तम नगर, नई दिल्ली लेखन - जाने कब से भाषा - हिन्दवी संगीत - भारतीय शास्त्रीय संगीत ग़ज़लें - मेंहदी हसन, गुलाम अली, बेगम अख्तर रूचि- पेंटिंग, लेखन, संगीत सुनना ब्लॉग - manu-uvaach.blogspot.com ई-मेल - manu2367@gmail.com खाली प्याले, निचुड नीम्बू, टूटे बुत सा अपना हाल कब सुलगी दोबारा सिगरेट ,होकर जूते से पामाल रैली,परचम और नारों से कर डाला बदरंग शहर वोटर को फिर ठगने निकले, नेता बनकर नटवरलाल चन्दा पर या मंगल पर बसने की जल्दी फिक्र करो बढती जाती भीड़, सिमटती जाती धरती सालों साल गांधी-गर्दी ठीक है लेकिन ऐसी भी नाचारी क्या झापड़ खाकर एक पे आगे कर देते हो दूजा गाल यार, बना कर मुझको सीढी, तू बेशक सूरज हो जा देख कभी मेरी भी जानिब,मुझको भी कुछ बख्श जलाल उनके चांदी के प्यालों में गुमसुम देखी लालपरी अपने कांच के प्याले में क्या रहती थी खुशरंग-जमाल आगे पढ़ें के आगे यहाँ