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ये नेता महिलाओं को इस्तेमाल की चीज क्यों मानते हैं?

शेष नारायण सिंह ♦ शेष नारायण सिंह बि हार में सत्ताधारी दल के एक विधायक को उसके घर पर ही चाकू घोंप कर मार डाला गया। जिस महिला ने उनके ऊपर जानलेवा हमला किया, उसने आरोप लगाया है कि विधायक ने उसका यौन शोषण किया था, उसके परिवार को मारा पीटा था, उसको जान से मारने की धमकी दी थी और उसके परिवार की शांति को छिन्न-भिन्न कर दिया था। उस महिला का नाम रूपम पाठक है और उसने इस अत्याचार के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी थी लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। उस पर दबाव डाल कर केस को वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया गया। लगता है कि कहीं से भी न्याय की उम्मीद से निराश होने के बाद उसने यह कदम उठाया। हत्या एक जघन्य अपराध है और उसकी निंदा की जानी चाहिए। हत्या जैसा जघन्य अपराध करने वाले को भारतीय दंड संहिता के आधार पर दंड दिया जाना चाहिए। ताजा खबर यह है कि अदालत ने रूपम पाठक को चौदह दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। राज्य के मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने पत्रकारों से बता दिया है कि मामले के सीबीआई जांच की कोई जरूरत नहीं है और जुडीशियल जांच की भी कोई जरूरत नहीं है। राज्य की पुलिस पूरी तरह से सक्षम है और वह जांच क...

राष्ट्रबंडल खेल

कोंपल श्रीवास्तव ..15 अक्टूबर 2010... कॉमनवेल्थ गेम्स का आज आखिरी दिन था। क्या चकाचौंध थी, आतिशबाज़ी से सज़ा आसमान, स्टेडियम में हज़ारों थिरकते कदम, भारत का झंडा लिए हमारे खिलाड़ी जिन्होंने कमाल करते हुए पूरे 100 पदको का रिकॉर्ड कायम किया...एआर रहमान का जोशीला गाना और रौशनी से नहायी पूरी दिल्ली...पूरा शहर शेरा के पोस्टरों से सजा हुआ था...शेरा की टीशर्ट पहने बच्चे बड़े,शेरा की टोपी, शेरा का बैग, शेरा गुब्बारों पर शेरा मेट्रो की दीवारों पर, दिल्ली के बीआरटी कॉरिडोर में दौड़ती बसों पर...शेरा ही शेरा...भला हो इन कॉमनवेल्थ गेम्स का दिल्ली की तो शक्ल ही बदल गई है। पूरी दिल्ली मेट्रों से जुड़ गयी है, चौड़ी चिकनी सड़कों पर सरपट दौड़ती गाड़ियां, एक से दूसरे फ्लाएऔवर पर ट्रैफिक बिना गाड़ी चलाने का मज़ा। सफायी ऐसी की सिंगापुर को पछाड़ दे...बेहतरीन स्टेडियम, पांच सितारा होटल, गेम्स विलेज के आलीशान फ्लैट भई वाह...दिल्ली में रहने पर फख्र हो रहा है। माफ कर दीजिए शीलाजी, कलमाडी साहब...हम देख नहीं पाए आपका कमाल और बहुत बुरा भला कहा आपको। आपने तो जादू कर दिया, कहा जा रहा है कि इस आयोजन के बाद पर्यटकों क...
प्‍लीज, अनुराग कश्‍यप को कठघरे में खड़ा मत करिए ♦ मनोज बाजपेयी पिछले दिनों काफी गहमागहमी रही। यहां का दस्तूर ही कुछ ऐसा है। जब तक आपकी फिल्म हिट न हो आपको व्यस्त नहीं रखा जाता। अभी तक मैं अपने जीवन में मशगूल था। अपने तरीके की छोटी बड़ी फिल्में करता था। लेकिन, कुछ दिनों से एक हिट का मुंह नहीं देखा था। इस कारण लोगों की नजरों में चढ़ा नहीं था। इज्जत थी, प्यार था, लेकिन गहमागहमी से दूर था। लेकिन, राजनीति की सफलता के साथ काफी कुछ बदल गया है। एक फिल्म के सफल होने के साथ ही कई सारे लोगों की आशाओं को पूरा करना पड़ता है। और फिर पारिवारिक जिम्मेदारियां। घर में सिर्फ मैं और मेरी पत्नी। और पूरा करने के लिए घर के बहुत सारे काम। इसी में उलझा रहा और लिखने से दूर भागता रहा। लेकिन, एक दो दिन पहले जब मुझे मोहल्‍ला लाइव द्वारा आयोजित बहस में अनुराग कश्यप को बुलाने और उनसे हुई बहस के बारे में जानकारी हुई तो मैंने उसे पढ़ा और फिर मुझे लगा कि लिख ही डालूं। मेरी बहुत बड़ी शिकायत है हमारे पत्रकार मित्रों से। बहुतों से मैं लगातार मिलता हूं और कइयों से पहचान है मेरी। अनुराग कश्यप को बुलाकर उनके होने पर ह...

पृथ्वी पर इस्लाम का समय अब पूरा हो चुका है ?

अनिरुद्ध शर्मा अमेरिका में कार बम विस्फोट के सिलसिले में पाक-अमेरिकी नागरिक गिरफ्तार. ये कुछ दिनों पहले की खबर है और इस तरह की खबरें अमूमन हर थोड़े दिन में सुनने में आती हैं. दुनिया धीरे-धीरे दो भागों में बंटती जा रही है - एक इस्लामिक और एक गैर-इस्लामिक. ये सच है कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता और ये भी सच है कि दुनिया का 8० फीसदी आतंकवाद इस्लामिक आतंकवाद है. मेरी बात को अन्यथा कतई न लिया जाए, मैं एक धर्म के रूप में इस्लाम का सम्मान करता हूँ. मैं पैगम्बर मोहम्मद के जीवन से वाकिफ हूँ. मोहम्मद का पूरा जीवन लड़ाइयों में बीता लेकिन फिर भी उनका सन्देश शांति और भाईचारे का था. लडाइयां उनकी मजबूरी थी क्योंकि वो समय, वो परिस्थितियाँ कुछ और थी. आदमी जंगली था और आपसी लड़ाइयों में उलझा हुआ था, उसे एकजुट करने के लिए उन्होंने सबको जीता. लेकिन समय बदलने के साथ बहुत सी चीज़ें बेकार हो जाती हैं, सिर्फ वस्तुएं ही नहीं, विचार और क़ानून-कायदे भी बेकार हो जाते हैं. वो समय कब का बीत चुका. उस समय की दुनिया और आज की दुनिया में ज़मीन-आसमान का फर्क आ चुका है लेकिन इस्लाम के अनुयायी इसे स्वीकार करने से इनकार क...

समझौता और संघर्ष का नाम है सिनेमा

विवेका बाबाजी की मौत ने हमें एक बार फिर गहन चिंतन के लिए मजबूर कर दिया है, क्या हकीकत में यह आत्महत्या थी? या हत्या ? अब इस बात से बहुत भारी फर्क पड़ने वाला नहीं है क्योंकि हर सवाल का जवाब विवेका के साथ ही दफ़न हो चुका है और जो इसके लिए गुनाहगार है, वो शरीफों की बिसात में सबसे आगे खड़ें होंगे. विवेका अपने घरवालों से दूर रखकर संघर्ष कर रही थी और सच तो ये है की उसके संघर्ष के दिन अब ख़त्म हुए थे ऐसे में उसके पास जीने की काफी वजह थी.लेकिन इस तरह से सब कुछ ख़त्म कर देना यह विवेका का उठाया कदम कभी नहीं हो सकता. फ़िल्मी दुनिया बढ़ी ही चमक दमक से लोत पोत है जिसके लिबासों के नीचे अनगिनत लोगों की मिटने के निशाँ है वो कहते है है न की जो चीज़ जितनी जायदा सुन्दर दिखाई देती है उसके बनने की दास्ताँ उतनी ही भयानक होती है. आज जिस तरह से युवा बर्ग फिल्मों एवं ग्लेमर के प्रति ललायित हो रहा है उसका जीता जागता उदाहरण मैंने 2009 में मुंबई में देखा. मैं एक न्यूज़ चैनेल के काम से मुंबई गया हुआ था मैंने देखा की हर एक फिल्म स्टूडियो और ऑफिस के बाहर भारी संख्या में ऐसे युवा खड़े थे जिनके पास अन्दर जाने या क...

तभी एक बेहतर दुनिया देख पायेंगे

संवाद अनवर फ़ज़ल से बिजू नेगी की बातचीत राइट लाईवलीहुड कॉलेज के निदेशक व यूनिवर्सिटी सेंस मलेशिया, पेनांग से संबद्ध अनवर फ़ज़ल दुनिया भर की कई नागरिक अभियानों व संस्थाओं के प्रणेता रहे हैं. कंज्यूमर्स इंटरनेशनल के अध्यक्ष रहे 69 साल के अनवर फ़ज़ल को वैकल्पिक नोबल पुरुस्कार राइट लाईवलीहुड अवार्ड, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का ग्लोबल 500 सम्मान, गांधी-किंग-इकेदा शांति पुरस्कार, मलेशिया के सम्मानित मानोपाधि ‘दातो’समेत कई पुरस्कार और सम्मान मिले हैं. पिछले दिनों कंज्यूमर्स इंटरनेशनल की स्थापना के 50 साल पूरे होने पर कुआलालंपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में अनवर फ़ज़ल को संस्थान का प्रथम लाईफटाईम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया. इस अवार्ड के साथ दिये गये प्रशस्ति पत्र में उन्हें अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता आंदोलन के इतिहास में सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्ति कहा गया. उसी अवसर पर उनसे की गई बातचीत के अंश यहां प्रस्तुत हैं. • कंज्यूमर्स इंटरनेशनल की स्थापना के 50 वर्ष पूरे होने पर आपने कहा कि “50 वर्ष पूर्व कंज्यूमर्स इंटरनेशनल का जन्म हुआ, जिसका तब समय आ गया था.” आप क्या समझते हैं, क्या वह समय अ...

देश के लिए एक साल

अरुण कटियार इससे पहले कहिए, क्या खबर है? लो क सं घ र्ष !: कितने मुनासिब हैं विशेष पुलिसिया दस्ते दूरदर्शन को सोखकर रसूखदार हुए रजत जरूरी नहीं कि केवल कंपनियों, सरकार या स्थानीय प्रशासन को ही संसाधन की बर्बादी की समस्या से दो-चार होना पड़ता हो। दुखद सच्चाई यह है कि संपदा या संसाधन की बर्बादी का नाता आप और मुझ जैसे व्यक्तियों से भी हो सकता है। इससे भी दुखद यह कि मुमकिन है आप और हम भी ऐसे लोगों की श्रेणी में आते हों, जो व्यर्थ गंवा दिए गए संसाधनों की तरह हों। जरा इस बारे में सोचें। गर्मियां बीत चुकी हैं। लेकिन मैं उम्मीद करता हूं कि गर्मियों में अक्सर नजर आने वाला यह दृश्य आपने जरूर देखा होगा: खाली पड़े स्कूली मैदानों को अपनी कदमताल की आवाज से गुंजाते एनसीसी (नेशनल कैडेट कोर) के नौजवान कैडेट्स। यह नजारा बहुत आम है। हर सुबह देशभर के अनेक स्कूलों से विद्यार्थी बसों में सवार होकर एनसीसी के निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने के लिए चल पड़ते हैं। आखिर क्या है वह लक्ष्य, जिसके लिए हमारे युवा मुस्तैदी से जुटे हैं? और उस लक्ष्य को वे किस तरह हासिल करना चाहते हैं? वह लक्ष्य है भारत के युवाओं को ...