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शिवराज या फिर मोदी?

आशुतोष मैनेजिंग एडिटर आईबीएन7 आशुतोष जी एक तेज तर्रार सोच के धनी व्यक्ति है,उनकी भाषाशैली और अपनी बात कहने का अंदाज़ पत्रकारिता और मीडिया की नयी पहचान को बंया करती है! आशुतोष जी का यह लेख काफी प्रभावशाली है!इसे मैंने ibn7 वेबसाइट से साभार यहाँ प्रकाशित किया है गाली-गलौच के बीच आम धारणा यही बनती है कि ये राजनीति अपने लायक नहीं है। यहां सभ्य पढ़े लिखे लोगों के लिए जगह नहीं है। राजनीति करने के लिए किसी जाति विशेष या फिर किसी धर्म विशेष का होना जरूरी है। या फिर अपराध की दुनिया में पीएचडी तो हो ही। और अगर कुछ भी न किया हो तो इतना पैसा बैंक में हो कि वो आसानी से किसी भी पार्टी का टिकट खरीद सके। अगर दंगा कराना आता है तो किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब भी देख सकते है और शायद कुछ धन कुबेर आपको प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर भी पेश कर सकते हैं। लेकिन यकीन जानिए देश के लोकतंत्र की ये तस्वीर बदल रही है। हाल के दिनों में कुछ बुनियादी बदलाव की आहट आने लगी है। बहुत दूर नहीं बिहार ही चले जाइए। नीतीश बमबम हैं जबकि लालू खिसियाए हुए । बिहार के बारे में मशहूर था कि जाति बल, धर्म ब...

गीतिका - आचार्य संजीव 'सलिल'

'सलिल' को दे दर्द अपने, चैन से सो जाइए. नर्मदा है नेह की, फसलें यहाँ बो जाइए. चंद्रमा में चांदनी भी और धब्बे-दाग भी. चन्दनी अनुभूतियों से पीर सब धो जाइए. होश में जब तक रहे, मैं-तुम न हम हो पाए थे. भुला दुनिया मस्त हो, मस्ती में खुद खो जाइए. खुदा बनने था चला, इंसा न बन पाया 'सलिल'. खुदाया अब आप ही, इंसान बन दिखलाइए. एक उँगली उठाता है जब भी गैरों पर; सलिल' तीन उँगली चीखती हैं, खुद सुधर कर आइए.