बहुत दिनों के बाद जूते का महत्व सामने आया। "हम आपके हैं कौन" की माधुरी दीक्षित का गाना 'जूते लो पैसे दो " वाला गाना बहुत हीं भाया था । जूते को देखना अच्छा लगा था । सल्लू मियां की जूतों को लेकर बेचैनी गुदगुदी पैदा कर रही थी । इससे पहले जूता मेरी ज़िन्दगी का बहुत हीं बदनाम वस्तु था। खेलने के नाम पर भइया अक्सर अपना जूता मुझपर साफ़ किया करते थे । कुछ पश्चीम के विद्वानों ने भी जूते का महिमागान बड़ी हीं तन्मयता से किया है। किसी ने कहा था की व्यक्ति की पहचान उसके जूते से होती है । यह मोची टाइप दृष्टिकोण मुझे बड़ा अच्छा लगा था , और मैंने हरसंभव इसको अपनाया था । पर लोगो ने इसका अर्थ ये भी निकला की मैं बड़ा शर्मीला हूँ , नज़रे जो झुक जाती थी बात करते वक्त ! दोस्तों ने इसका अपना अलग अर्थ लगाया , कहा की भाई बड़ी बुरी निगाह है तेरी ...एक्चुअली मैंने ये फंडा कन्याओं पे भी लगाया था । कालांतर में भी वाजिब मांगो पर भी घर के हुक्मरान जूते की बात कर दिया करते थे । गाँव के ज़मींदार द्वारा अक्सर गरीबों को जूते से पिटते देखा करता था, कभी लगान के नाम पर तो कभी ऊँची आवाज़ में बात करने के कारण।...