कविता माँ 'सलिल' माँ भूलती नहीं, याद रखती है हर टूटा सपना। नहीं चाहती कि उसकी बेटी को भी पड़े उसी की तरह आग में तपना। माँ जानती है जिन्दगी kee बगिया में फूल कम - शूल अधिक हैं, उसे यह भी ज्ञात है कि समय सदा साथ नहीं देता। वह अपनी राजदुलारी को रखना चाहती है महफूज़ नहीं चाहती कि उस जान से ज्यादा अज़ीज़ बेटी पर कभी भी उठे उँगली। इसलिए वह भीतर से नर्म hote hue भी ऊपर से दिखती है कठोर। जैसे raat की सियाही छिपाए रहती है अपने दामन में उजली भोर। *****************************