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शूर्पनखा

सूर्पनखा भी एक पात्र है , जग्विजयी रावण की भगिनी। बनी कुपात्र परिस्थितियों वश , विधवा किया स्वयं भ्राता ने । राज्य मोह पदलिप्सा कारण , पति रावण विरोध पथ पर था। कैकसि और विश्रवा ऋषि की , थी सबसे कनिष्ठ संतान । अतिशय प्रिय परिवार दुलारी , सारी हठ पूरी होतीँ थीं। मीनाकृति सुंदर आँखें थीं , जन्म नाम मीनाक्षी पाया। लाड प्यार मैं पली बढ़ी वह , माँ कैकसि सम रूप गर्विता । शूर्प व लंबे नख रखती थी , शूर्पनखा इसलिए कहाई । शुकाकृति थी सुघड़ नासिका , शूर्प नका भी कहलाती थी । जन स्थान की स्वामिनी थी वह, था अधिकार दिया रावण ने । पर पति की ह्त्या होने पर, घृणा द्वेष का ज़हर पिए थी । पूर्ण राक्षसी भाव बनाकर , अत्याचार लिप्त रहती थी । अश्मक द्वीप ,अश्मपुर शासक , कालिकेय दानव विध्युत्ज़िहव; प्रेमी था वह शूर्पनखा का , रावण को स्वीकार नहीं था। सिरोच्छेद कर विध्युत्जिब का , नष्ट कर दिया अश्मकपुरको । पति ह्त्या से आग क्रोध की, लगी धधकने शूर्पनखा में । पुरूष जाति प्रति घृणा भाव मैं , शीघ्र बदलकर तीव्र होगई । प्रेम पगी वह सुंदर रूपसि , एक कुटिल राक्षसी बन गयी। यह दायित्व पुरूष का ही है, सदा रखे सम्मान नारि का । ...