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मुक्तिका: किस चरण का अनुकरण --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका: किस चरण का अनुकरण संजीव 'सलिल' * किस चरण का अनुकरण जन-जन करे. हर चरण के आचरण हैं जब बुरे.. गले मिलते मुस्कुराते मीत कह पीठ पीछे हाथ में थामे छुरे.. हैं बुरे, बनते भले जो आजकल. हैं भले जो आजकल लगते बुरे.. मायके में गुजर कब किसकी हुई? खोज प्रियतम को चलो अब सासरे.. सच कहो तो मानते सब गैर हैं. कहें मनचाही वही हैं खास रे.. बढ़ी है सुविधाएँ, वैभव, कीर्ति, धन. पर आधार से गुम गया है हास रे.. साँस तेरा साथ चाहे छोड़ दे. 'सलिल' जीते जी न तजना आस रे.. ************************** दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

गीतिका: तुमने कब चाहा दिल दरके? --संजीव वर्मा 'सलिल'

गीतिका संजीव वर्मा 'सलिल' * तुमने कब चाहा दिल दरके? हुए दिवाने जब दिल-दर के। जिन पर हमने किया भरोसा वे निकले सौदाई जर के.. राज अक्ल का नहीं यहाँ पर ताज हुए हैं आशिक सर के। नाम न चाहें काम करें चुप वे ही जिंदा रहते मर के। परवाजों को कौन नापता? मुन्सिफ हैं सौदाई पर के। चाँद सी सूरत घूँघट बादल तृप्ति मिले जब आँचल सरके. 'सलिल' दर्द सह लेता हँसकर सहन न होते अँसुआ ढरके। **********************

दोहा गीतिका 'सलिल'

(अभिनव प्रयोग) दोहा गीतिका 'सलिल' * तुमको मालूम ही नहीं शोलों की तासीर। तुम क्या जानो ख्वाब की कैसे हो ताबीर? बहरे मिलकर सुन रहे गूँगों की तक़रीर। बिलख रही जम्हूरियत, सिसक रही है पीर। दहशतगर्दों की हुई है जबसे तक्सीर वतनपरस्ती हो गयी खतरनाक तक्सीर। फेंक द्रौपदी खुद रही फाड़-फाड़ निज चीर। भीष्म द्रोण कूर कृष्ण संग, घूरें पांडव वीर। हिम्मत मत हारें- करें, सब मिलकर तदबीर। प्यार-मुहब्बत ही रहे मजहब की तफसीर। सपनों को साकार कर, धरकर मन में धीर। हर बाधा-संकट बने, पानी की प्राचीर। हिंद और हिंदी करे दुनिया को तन्वीर। बेहतर से बेहतर बने इन्सां की तस्वीर। हाय! सियासत रह गयी, सिर्फ स्वार्थ-तज़्वीर। खिदमत भूली, कर रही बातों की तब्ज़ीर। तरस रहा मन 'सलिल' दे वक़्त एक तब्शीर। शब्दों के आगे झुके, जालिम की शमशीर। ********************************* तासीर = असर/ प्रभाव, ताबीर = कहना, तक़रीर = बात/भाषण, जम्हूरियत = लोकतंत्र, दहशतगर्दों = आतंकवादियों, तकसीर = बहुतायत, वतनपरस्ती = देशभक्ति, तकसीर = दोष/अपराध, तदबीर = उपाय, तफसीर = व्याख्या, तनवीर = प्रकाशि...