Skip to main content

Posts

Showing posts with the label नवगीत

नवगीत: नर-नारी -आचार्य संजीव 'सलिल'

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ कौन यहाँ नर? नारी कौन?... शब्द ब्रम्ह के सभी उपासक, सत-शिव-सुन्दर के आराधक. मन न दुखाएँ कभी किसी का बेहतर है रह जाएँ मौन. कौन यहाँ नर? नारी कौन?..... खुसरो मीरां में क्या अंतर? दोनों पढें प्रेम का मंतर. सिर्फ एक नर- परम-आत्मा जाने आत्मा नारी जौन. कौन यहाँ नर? नारी कौन?..... *********8

नवगीत

गीत आचार्य संजीव 'सलिल' आपा-धापी, दौड़ा-भागी, हाय! यही अब रही जिंदगी... राहु-केतु से रवि-शशि हैराँ। असत सत्य को करे परेशां। दाना पर हावी हैं नादां- है बनावटी, देव-बंदगी... सदियाँ भोगें पलों की खता। नातों से है नेह लापता। मन को तन ही रहा है सता। घर-घर व्यापी है दरिंदगी... ***********

नवगीत: आचार्य संजीव 'सलिल'

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ नवगीत आचार्य संजीव 'सलिल' हवा में ठंडक बहुत है... काँपता है गात सारा ठिठुरता सूरज बिचारा. ओस-पाला नाचते हैं- हौसलों को आँकते हैं. युवा में खुंदक बहुत है... गर्मजोशी चुक न पाए, पग उठा जो रुक न पाए. शेष चिंगारी अभी भी- ज्वलित अग्यारी अभी भी. दुआ दुःख-भंजक बहुत है... हवा बर्फीली-विषैली, नफरतों के साथ फैली. भेद मत के सह सकें हँस- एक मन हो रह सकें हँस. स्नेह सुख-वर्धक बहुत है... चिमनियों का धुँआ गंदा सियासत है स्वार्थ-फंदा. उठो! जन-गण को जगाएँ- सृजन की डफली बजाएँ. चुनौती घातक बहुत है... नियामक हम आत्म के हों, उपासक परमात्म के हों. तिमिर में भास्कर प्रखर हों- मौन में वाणी मुखर हों. साधना ऊष्मक बहुत है... divyanarmada.blogspot.com divynarmada@gm...
गीत आचार्य संजीव 'सलिल' संकट में, हिम्मत मत हार। कोशिश का खुला रहे द्वार.... शूल बीन फूल नित बिखेर। हो न दीन, कर नहीं अबेर। तम को कर सूरज बन पार.... माटी की महक नहीं भूल। सर न चढ़े पैर दबी धुल। मारों पर न करना तू वार... कल को दे कल से अब जोड़। नातों को पल में मत तोड़। कलकल कर बहे 'सलिल'-धार... ************ कलकल कर बहे 'सलिल'-धार...