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नेपाल यात्रा - संजीव सलिल

चिटठा-लेखन तथा अंतर्जाल पत्रकारिता : द्विदिवसीय कार्यशाला

'व्यष्टि से समष्टि तक वही पहुंचे जो सर्व हितकारी हो'-- संजीव सलिल जबलपुर, १९ अप्रैल २००९. ''चिटठा लेखन वैयक्तिक अनुभूतियों की सार्वजानिक अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र नहीं है, यह निजता के पिंजरे में क़ैद सत्य को व्यष्टि से समष्टि तक पहुँचने का उपक्रम भी है. एक से अनेक तक वही जाने योग्य है जो 'सत्य-शिव-सुन्दर' हो, जिसे पाकर 'सत-चित-आनंद' की प्रतीति हो. हमारी दैनन्दिनी अंतर्मन की व्यथा के प्रगटीकरण के लिए उपयुक्त थी चूंकि उसमें अभिव्यक्त कथ्य और तथ्य तब तक गुप्त रहते थे जब तक लेखक चाहे किन्तु चिटठा में लिखा गया हर कथ्य तत्काल सार्वजानिक हो जाता है, इसलिए यहाँ तथ्य, भाषा, शैली तथा उससे उत्पन्न प्रभावों के प्रति सचेत रहना अनिवार्य है. अंतर्जाल ने वस्तुतः सकल विश्व को विश्वैक नीडं तथा वसुधैव कुटुम्बकम की वैदिक अवधारणा के अनुरूप 'ग्लोबल विलेज' बना दिया है. इन माध्यमों से लगी चिंगारी क्षण मात्र में महाज्वाला बन सकती है, यह विदित हो तो इनसे जुड़ने के अस्त ही एक उत्तरदायित्व का बोध होगा. जन-मन-रंजन करने के समर्थ माध्यम होने पर भी इन्हें केवल मनोविनोद तक सीमि...

कुण्डली --आचार्य संजीव 'सलिल'

इधर चुनाव उधर क्रिकेट, दो-दो देखो मैच। कौन कहाँ पर ड्राप हो, कौन कहाँ पर कैच? कौन कहाँ पर कैच, फैसला दे एम्पायर। जो जीते हो हीरो, हारा हो वैम्पायर। कहे 'सलिल' कविराय बजाओ जी भर ताली। कुछ भी करो न काम व्यवस्था को दो गाली।
मुक्तक जो दूर रहते हैं वही तो पास होते हैं. जो हँस रहे, सचमुच वही उदास होते हैं. सब कुछ मिला 'सलिल' जिन्हें अतृप्त हैं वहीं- जो प्यास को लें जीत वे मधुमास होते हैं. पग चल रहे जो वे सफल प्रयास होते हैं न थके रुक-झुककर वही हुलास होते हैं। चीरते जो सघन तिमिर को सतत 'सलिल'- वे दीप ही आशाओं की उजास होते है। जो डिगें न तिल भर वही विश्वास होते हैं. जो साथ न छोडें वही तो खास होते हैं. जो जानते सीमा, 'सलिल' कह रहा है सच देव! वे साधना-साफल्य का इतिहास होते हैं *********************************
तेवरी आचार्य संजीव 'सलिल' खोटे सिक्के हैं प्रचलन में. खरे न बाकी रहे चलन में. मन से मन का मिलन उपेक्षित. तन को तन की चाह लगन में. अनुबंधों के प्रतिबंधों से- संबंधों का सूर्य गहन में. होगा कभी, न अब बाकी है. रिश्ता कथनी औ' करनी में. नहीं कर्म की चिंता किंचित- फल की चाहत छिपी जतन में. मन का मीत बदलता पाया. जब भी देखा मन दरपन में. राम कैद ख़ुद शूर्पणखा की, भरमाती मादक चितवन में. स्नेह-'सलिल' की निर्मलता को- मिटा रहे हम अपनेपन में. * * * * * समन्वयम, २०४ विजय अपार्टमेन्ट, नेपियर टाऊन, जबलपुर ४८२००१ vaartaa : ०७६१-२४१११३१, चलभाष: 0९४२५१ ८३२४४ई मेल: सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम , ब्लॉग: संजिवसलिल.ब्लागस्पा ट.com