बचपन से सुना करते थे कि ऊपर वाले के यहाँ देर है अंधेर नहीं ! लेकिन देश के मौजूदा सड़े हुए तंत्र में जिस तरह से आम जनता का भरोसा उठ गया है वह भी एक गंभीर समस्या ही है. समीउद्दीन नीलू उत्तर प्रदेश के लखीमपुर ज़िले में विगत एक दशक से ज़्यादा समय से हिंदी दैनिक समाचार पत्र अमर उजाला में बतौर संवाददाता अपनी सेवा कर रहें हैं. शीर्षकान्तर न हो इसलिए मैं यह बताना चाहूँगा कि कैसे मेरे भाई को यूपी की बल्कि लखीमपुर-खीरी की एस पी 'पद्मजा' ने अपने सरकारी पॉवर का दुरुपयोग करते हुए मानवता के क्रूरतम, तंत्र के दुष्टतम कृत्य को मात्र अपने गलत व समाज विरोधी कार्यों को छिपने के उद्देश्य से, जान से मारने की कोशिश (एनकाउन्टर) की और अपने नीचे कार्य करने आले पुलिस वालों की सहायता के ज़रिये उन्हें वन्य जीव अधिनियम के केस में फ़र्ज़ी तरीक़े से जेल भिजवा दिया. लेकिन कहते हैं कि सांच को आंच नहीं, बस कुछ ऐसा ही हुआ. लखनऊ मंडल और बरेली मंडल में वकीलों, किसानों, मजदूरों, पत्रकारों और हाकरों द्वारा किये गए जन-आन्दोलन के चलते प्रशासन के बालों में जूं रेंगी और उन्हें लगभग 9 दिन जेल में रहने के बाद ...