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नवगीत: लोकतंत्र के शहंशाह की जय... आचार्य संजीव 'सलिल'

नवगीत: लोकतंत्र के शहंशाह की जय... * राजे-प्यादे कभी हुए थे. निज सुख में नित लीन मुए थे. करवट बदले समय मिटे सब- तनिक नहीं संशय. कोपतंत्र के शहंशाह की जय.... * महाकाल ने करवट बदली. गायब असली, आये नकली. सिक्के खरे नहीं हैं बाकि- खोटे हैं निर्भय. लोभतंत्र के शहंशाह की जय... * जन-मत कुचल माँगते जन-मत. मन-मथ,तन-मथ नाचें मन्मथ. लोभ, हवस, स्वार्थ-सुख हावी करुनाकर निर्दय. शोकतंत्र के शहंशाह की जय.... ******

नवगीत:: अपना हर पल है हिन्दीमय --संजीव 'सलिल'

नवगीत: संजीव 'सलिल' अपना हर पल है हिन्दीमय एक दिवस क्या खाक मनाएँ? बोलें-लिखें नित्य अंग्रेजी जो वे एक दिवस जय गाएँ... निज भाषा को कहते पिछडी. पर भाषा उन्नत बतलाते. घरवाली से आँख फेरकर देख पडोसन को ललचाते. ऐसों की जमात में बोलो, हम कैसे शामिल हो जाएँ?... हिंदी है दासों की बोली, अंग्रेजी शासक की भाषा. जिसकी ऐसी गलत सोच है, उससे क्या पालें हम आशा? इन जयचंदों की खातिर हिंदीसुत पृथ्वीराज बन जाएँ... ध्वनिविज्ञान- नियम हिंदी के शब्द-शब्द में माने जाते. कुछ लिख, कुछ का कुछ पढने की रीत न हम हिंदी में पाते. वैज्ञानिक लिपि, उच्चारण भी शब्द-अर्थ में साम्य बताएँ... अलंकार, रस, छंद बिम्ब, शक्तियाँ शब्द की बिम्ब अनूठे. नहीं किसी भाषा में मिलते, दावे करलें चाहे झूठे. देश-विदेशों में हिन्दीभाषी दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाएँ... अन्तरिक्ष में संप्रेषण की भाषा हिंदी सबसे उत्तम. सूक्ष्म और विस्तृत वर्णन में हिंदी है सर्वाधिक सक्षम. हिंदी भावी जग-वाणी है निज आत्मा में 'सलिल' बसाएँ... ******************** ...