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पित्तृ दिवस पर : स्मृति गीत / शोक गीत --संजीव 'सलिल'

पित्तृ  दिवस पर : स्मृति गीत / शोक गीत संजीव 'सलिल' * याद आ रही पिता तुम्हारी याद आ रही पिता तुम्हारी... * तुम सा कहाँ मनोबल पाऊँ? जीवन का सब विष पी पाऊँ. अमृत बाँट सकूँ स्वजनों को- विपदा को हँस सह मुस्काऊँ. विधि ने काहे बात बिगारी? याद आ रही पिता तुम्हारी... * रही शीश पर जब तव छाया. तनिक न विपदा से घबराया. आँधी-तूफां जब-जब आये- हँसकर मैंने गले लगाया. बिना तुम्हारे हुआ भिखारी. याद आ रही पिता तुम्हारी... * मन न चाहता खुशी मनाऊँ. कैसे जग को गीत सुनाऊँ? सपने में आकर मिल जाओ- कुछ तो ढाढस- संबल पाऊँ. भीगी अँखियाँ होकर खारी. याद आ रही पिता तुम्हारी... *  

मुक्तक : माँ के प्रति प्रणतांजलि: संजीव 'सलिल'

मुक्तक : माँ के प्रति प्रणतांजलि: संजीव 'सलिल' माँ के प्रति प्रणतांजलि: तन पुलकित, मन सुरभित करतीं, माँ की सुधियाँ पुरवाई सी. दोहा गीत गजल कुण्डलिनी, मुक्तक छप्पय रूबाई सी.. मन को हुलसित-पुलकित करतीं, यादें 'सलिल'  डुबातीं दुख में- होरी गारी बन्ना बन्नी, सोहर चैती शहनाई सी..  * मानस पट पर अंकित नित नव छवियाँ ऊषा अरुणाई सी. तन पुलकित, मन सुरभित करतीं, माँ की सुधियाँ पुरवाई सी.. प्यार हौसला थपकी घुड़की, आशीर्वाद दिलासा देतीं- नश्वर जगती पर अविनश्वर विधि-विधना की परछांई सी.. * उँगली पकड़ सहारा देती, गिरा उठा गोदी में लेती. चोट मुझे तो दर्द उसे हो, सुखी देखकर मुस्का देती. तन पुलकित, मन सुरभित करतीं, माँ की सुधियाँ पुरवाई सी- 'सलिल' अभागा माँ बिन रोता, श्वास -श्वास है रुसवाई सी.. * जन्म-जन्म तुमको माँ पाऊँ, तब हो क्षति की भरपाई सी. दूर हुईं जबसे माँ तबसे घेरे रहती तन्हाई सी. अंतर्मन की पीर छिपाकर, कविता लिख मन बहला लेता- तन पुलकित, मन सुरभित करतीं, माँ की सुधियाँ पुरवाई सी * कौशल्या सी ममता तुममें, पर मैं राम नहीं बन प...

स्मृति गीत: सृजन विरासत --संजीव 'सलिल'

स्मृति गीत: संजीव 'सलिल' सृजन विरासत तुमसे पाई... * अलस सवेरे उठते ही तुम, बिन आलस्य काम में जुटतीं. सिगडी, सनसी, चिमटा, चमचा चौके में वाद्यों सी बजतीं. देर हुई तो हमें जगाने टेर-टेर आवाज़ लगाई. सृजन विरासत तुमसे पाई... * जेल निरीक्षण कर आते थे, नित सूरज उगने के पहले. तव पाबंदी, श्रम, कर्मठता से अपराधी रहते दहले. निज निर्मित व्यक्तित्व, सफलता पाकर तुमने सहज पचाई. सृजन विरासत तुमसे पाई... * माँ!-पापा! संकट के संबल गए छोड़कर हमें अकेला. विधि-विधान ने हाय! रख दिया है झिंझोड़कर विकट झमेला. तुम बिन हर त्यौहार अधूरा, खुशी पराई. सृजन विरासत तुमसे पाई... * यह सूनापन भी हमको जीना ही होगा गए मुसाफिर. अमिय-गरल समभावी हो पीना ही होगा कल की खातिर. अब न शीश पर छाँव, धूप-बरखा मंडराई. सृजन विरासत तुमसे पाई... * वे क्षर थे, पर अक्षर मूल्यों को जीते थे. हमने देखा. कभी न पाया ह्रदय-हाथ पल भर रीते थे युग ने लेखा. सुधियों का संबल दे प्रति पल राह दिखाई.. सृजन विरासत तुमसे पाई... *