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देश का दुर्भाग्य

देश का दुर्भाग्य देश का दुर्भाग्य है कि, एक तरफ इस बच्ची को उस खतरे से बचाए जाने कि गुहार लगानी पड़ रही हैं जिसकी इसे कल्पना तक नहीं है...तो दूसरी तरफ आयातित सनी लियोने बता रही है कि, बलात्कार का कारण पोर्न फ़िल्में नहीं बल्कि गन्दी मानसिकता के लोग इसके जिम्मेदार हैं, कोई उनसे पूछे कि, ये गन्दी मानसिकता आई कहाँ से?? वहीँ देश कि राजधानी में एक फिल्मकार सार्वजनिक मंच से फिल्मो में स्मोकिंग दृश्य के दौरान चेतावनी दिखने के नियम का विरोध करने के कुतर्क देने और कमीने जैसे शब्द को गाली नहीं साबित करने पर तुले हुए थे, एक युवा के विरोध करने पर अपने संस्कार के अनुसार उन्होने उसको डपटते हुए कहा " " Abey  tu Dilli se hai? Dilli mein toh baap bhi apne bete ko yehi kehta hai, 'Abey kameenay, idhar aa'. "   मै ये नहीं कहता कि, समाज कि इस गिरावट के लिए ये ही जिम्मेदार हैं,  पर ये सच है कि इस तरह के लोग बहाने बना कर अपने गुनाहों पर पर्दा नहीं डाल सकते. तस्वीर लखनऊ विधानसभा के सामने ३० अप्रैल, शाम की है / दिल्ली  के इंटरव्यू  का लिंक भी दे रहा हु, रूचि बने तो...

सिनेमा क्‍या है? चलती हुई तस्‍वीरें या सपनों का कारखाना?

♦ तत्याना षुर्लेई भारतीय सिनेमा के सौ साल की अभी खूब चर्चाएं हैं। लेकिन यह सौ साल इसी साल क्यूं? जबकि यूरोप में तो यह 1995 में मनाया जा चुका है। इसके सैद्धांतिक आधार क्या रहे हैं, क्या हैं? हिंदी में इसकी चर्चा नहीं के बराबर है। सिनेमा यथार्थ है या कल्पना? दस्तावेज है या रूपक? इन्हीं सवालों को तत्याना बहुत ही बारीकी से इस संक्षिप्त से नोट में हमें बताने की कोशिश करती हैं :  उदय शंकर यह लेख मोहल्‍ला लाइव की सिने बहसतलब के लिए तैयार की जा रही स्‍मारिका से लिया गया है। स्‍मारिका का संपादन प्रकाश के रे कर रहे हैं :  मॉडरेटर … सि नेमा बहुत पुराना आविष्कार नहीं है। उसका जन्म 28 दिसंबर 1895 को हुआ, जब  लिमिएर (Lumière) बंधु  ने पेरिस में अपना नया मशीन दिखाया। एक दिलचस्प बात यह है कि पहला शो ग्रैंड होटल के ‘इंडियन रूम’ मे किया गया। शायद यह जगह एक संकेत था कि आगे चलकर भारत फिल्मों का सबसे बड़ा व्यावसायिक केंद्र बन गया। पहले शो के बाद लोगों को पता चला कि यह आविष्कार कितना अच्छा है और सारी दुनिया बंधुओं की चलती हुर्इ तस्वीरें देखना चाहती थी। आस्ट्रेलिया (Austra...

समझौता और संघर्ष का नाम है सिनेमा

विवेका बाबाजी की मौत ने हमें एक बार फिर गहन चिंतन के लिए मजबूर कर दिया है, क्या हकीकत में यह आत्महत्या थी? या हत्या ? अब इस बात से बहुत भारी फर्क पड़ने वाला नहीं है क्योंकि हर सवाल का जवाब विवेका के साथ ही दफ़न हो चुका है और जो इसके लिए गुनाहगार है, वो शरीफों की बिसात में सबसे आगे खड़ें होंगे. विवेका अपने घरवालों से दूर रखकर संघर्ष कर रही थी और सच तो ये है की उसके संघर्ष के दिन अब ख़त्म हुए थे ऐसे में उसके पास जीने की काफी वजह थी.लेकिन इस तरह से सब कुछ ख़त्म कर देना यह विवेका का उठाया कदम कभी नहीं हो सकता. फ़िल्मी दुनिया बढ़ी ही चमक दमक से लोत पोत है जिसके लिबासों के नीचे अनगिनत लोगों की मिटने के निशाँ है वो कहते है है न की जो चीज़ जितनी जायदा सुन्दर दिखाई देती है उसके बनने की दास्ताँ उतनी ही भयानक होती है. आज जिस तरह से युवा बर्ग फिल्मों एवं ग्लेमर के प्रति ललायित हो रहा है उसका जीता जागता उदाहरण मैंने 2009 में मुंबई में देखा. मैं एक न्यूज़ चैनेल के काम से मुंबई गया हुआ था मैंने देखा की हर एक फिल्म स्टूडियो और ऑफिस के बाहर भारी संख्या में ऐसे युवा खड़े थे जिनके पास अन्दर जाने या क...