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शोपियां मामले में दोबारा पोस्टमार्टम का आदेश

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने शोपियां में दो महिलाओं के साथ कथित बलात्कार के बाद हत्या के मामले में एक अहम फ़ैसला सुनाया है. कोर्ट ने दो महिलाओं के शव क़ब्र से निकालकर दोबारा पोस्टमार्टम कराने का आदेश दिया है. 30 मई को इन दोनों महिलाओं के शव मिलने के बाद कश्मीर में काफ़ी हंगामा हुआ था. पुलिस ने शुरू में इसे दुर्घटना कहा था. लेकिन बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बाद पुलिस ने बलात्कार और हत्या का मामला दर्ज किया. स्थानीय लोगों का आरोप है कि भारतीय सुरक्षाकर्मियों ने बलात्कार के बाद इन महिलाओं की हत्या कर दी. फ़ॉरैंसिक टेस्ट में भी बलात्कार की पुष्टि हुई जिसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया. प्रदर्शन राजधानी श्रीनगर से 60 किलोमीटर दूर शोपियां में हुए प्रदर्शनों में दो लोग मारे गए और 400 से ज़्यादा घायल हुए थे. पिछले दिनों इस मामले में गठित एक सदस्यीय मुज़फ़्फ़र जान न्यायिक आयोग की अंतरिम रिपोर्ट आने के बाद चार पुलिसकर्मियों और फ़ॉरेंसिक साइंस लैब के एक अधिकारी को निलंबित कर दिया गया था. इस रिपोर्ट में इन चार पुलिस अधिकारियों और फ़ॉरेंसिक साइंस लैब के एक अधिकारी के ख़िलाफ़ मु...

किन परिस्थितियों में हुआ ऑपरेशन ब्लूस्टार..

अतुल संगर बीबीसी संवाददाता पच्चीस साल पहले सिख धर्म के सबसे पावन धार्मिक स्थल अमृतसर स्थित हरिमंदिर साहिब परिसर पर भारतीय सेना की कार्रवाई - ऑपरेशन ब्लूस्टार - को अंजाम दिया गया था. जहाँ इस कार्रवाई ने पंजाब समस्या को पूरे विश्व में चर्चित कर दिया वहीं इससे सिख समुदाय की भावनाएँ आहत हुईं और अनेक पर्यवेक्षक मानते हैं कि इस कदम ने समस्या को और जटिल बना दिया. उधर भारत सरकार और ऑपरेशन ब्लूस्टार के सैन्य कमांडर मेजर जनरल केएस बराड़ का कहना था कि उनकी जानकारी के मुताबिक कुछ ही दिनों में ख़ालिस्तान की घोषणा होना जा रही थी और उसे रोकने के लिए ऑपरेशन को जल्द से जल्द अंजाम देना ज़रूरी था. लेकिन इस सैन्य कार्रवाई की पृष्ठभूमि क्या थी और किन परिस्थितियों में ये कार्रवाई हुई? एक नज़र डालते हैं उन घटनाओं पर जो इससे पहले घटीं: पंजाब समस्या की शुरुआत 1970 के दशक से अकाली राजनीति में खींचतान और अकालियों की पंजाब संबंधित माँगों को लेकर शुरु हुई थी. पहले वर्ष 1973 में और फिर 1978 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया. मूल प्रस्ताव में सुझाया गया था कि भारत की केंद्र सरका...

'श्रीलंका में नागरिकों की हत्या की जाँच हो'

संयुक्त राष्ट्र में मुख्य मानवीय सहायता संयोजक जॉन होम्स ने माँग की है कि श्रीलंका में मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन के आरोपों की जाँच कराई जाए. पूर्वोत्तर श्रीलंका में तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ सेना की कार्रवाई में हज़ारों नागरिकों के मारे जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र के बाद अब एक ब्रितानी अख़बार 'द टाइम्स' ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ लड़ाई के दौरान बीस हज़ार से ज़्यादा नागरिक मारे गए. जॉन होम्स ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है, "तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ गंभीर आरोप हैं कि वे छिपने के लिए नागरिक शिविरों में चले गए, दूसरी ओर सेना पर आरोप है कि उसने रिहायशी इलाक़ों में भारी हथियारों का इस्तेमाल किया." उन्होंने पूरे मामले की जाँच के लिए अंतरराष्ट्रीय समिति गठित करने की माँग की है. इससे पहले बुधवार को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त नवी पिल्लई ने कहा था कि लड़ाई के दौरान दोनों पक्षों ने मानवाधिकारों को ताक पर रख दिया. हालाँकि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में जाँच कराने संबंधी प्रस्ताव पारित नहीं हो सका था. बीस...

109 साल की उम्र में भी कायम है देशभक्ती का जज्बा

ग्वालियर। दिल में जज्बा हो तो किसी काम को करने के लिए उम्र आड़े नहीं आती। ग्वालियर में रहने वाले 109 साल के बुजुर्ग अपने शहर में लगी स्वतंत्रता सेनानियों की मूर्तियों के रखरखाव में लगातार जुटे हैं। आजादी की लड़ाई में जिन लोगों ने योगदान दिया उनमें से एक है कक्का डोंगर सिंह। 109 साल के कक्का डोंगर सिंह आज भी युवाओं को इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि आजादी की जंग के नायकों को वे याद रखें क्योकि उनकी वजह से हम आजाद हैं। ये देन है उन वकील बैरिस्टर और बुद्धीजीवियों की जिन्होंने अपना सब कुछ खोकर हमें लोकतंत्र की तरफ भेजा और लोकतंत्र स्थापित किया। कक्का डोंगर सिंह ने आजादी के बाद कोशिश की कि ग्वालियर में उन महापुरषों की मुर्तियां लगायी जांए जिन्होंने आजादी की जंग का नेतृत्व किया उनकी कोशिशे रंग लायी। महात्मा गांधी, डॉक्टर अम्बेडकर, लाल बहादुर शास्त्री, रानी लक्ष्मीबाई जैसी कई लोगों की प्रतिमाएं ग्वालियर में लगाई गईं। अब कक्का डोंगर सिंह इन मूर्तियों की लगातार खुद सफाई करते हैं। कक्का को अभी भी इस बात का मलाल है कि जब पूरा देश 15 अगस्त 1947 को आजादी का जश्न मना रहा था उसी दौरान रियासत कालीन ...