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मुक्तिका:: कहीं निगाह... ---- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका::                                                                           कहीं निगाह... संजीव 'सलिल' * कदम तले जिन्हें दिल रौंद मुस्कुराना है. उन्ही के कदमों में ही जा गिरा जमाना है कहीं निगाह सनम और कहीं निशाना है. हज़ार झूठ सही, प्यार का फसाना है.. न बाप-माँ की है चिंता, न भाइयों का डर. करो सलाम ससुर को, वो मालखाना है.. पड़े जो काम तो तू बाप गधे को कह दे. न स्वार्थ हो तो गधा बाप को बताना है.. जुलुम की उनके कोई इन्तेहां नहीं लोगों मेरी रसोई के आगे रखा पाखाना है.. किसी का कौन कभी हो सका या होता है? अकेले आये 'सलिल' औ' अकेले जाना है.. चढ़ाये रहता है चश्मा जो आँख पे दिन भर. सचाई ये है कि बन्दा वो 'सल...

मुक्तिका: मानव विषमय.......... --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका: मानव विषमय... संजीव 'सलिल' * * मानव विषमय करे दंभ भी.  देख करे विस्मय भुजंग भी.. अपनी कटती देख तंग पर. काटे औरों की पतंग ही.. उड़ता रंग पोल खुलती तो होली खेले विहँस रंग की.. सत्ता पर बैठी माया से बेहतर लगते हैं मलंग जी. होड़ लगी फैशन करने की 'ही' ज्यादा या अधिक नंग 'शी'.. महलों में तन उज्जवल देखे लेकिन मन पर लगी जंग थी.. पानी खोकर पूजें उसको- जिसने पल में 'सलिल' गंग पी.. ************** दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पा ट.कॉम

गीतिका: कद छोटा परछाईं बड़ी है... ---आचार्य संजीव 'सलिल'

गीतिका संजीव 'सलिल' कद छोटा परछाईं बड़ी है. कैसी मुश्किल आई घड़ी है. चोर कर रहे पहरेदारी सच में सच रुसवाई बड़ी है.. बीवी बैठी कोष सम्हाले खाली हाथों माई खड़ी है.. खुद पर खर्च रहे हैं लाखों भिक्षुक हेतु न पाई पडी है.. 'सलिल' सांस-सरहद पर चुप्पी मौत शीश पर आई-अड़ी है.. *************************

ग़ज़ल बहुत हैं मन में लेकिन फिर भी कम -संजीव 'सलिल'

ग़ज़ल संजीव 'सलिल' बहुत हैं मन में लेकिन फिर भी कम अरमान हैं प्यारे. पुरोहित हौसले हैं मंजिलें जजमान हैं प्यारे.. लिये हम आरसी को आरसी में आरसी देखें. हमें यह लग रहा है खुद से ही अनजान हैं प्यारे.. तुम्हारे नेह के नाते न कोई तोड़ पायेगा. दिले-नादां को लगते हिटलरी फरमान हैं प्यारे.. छुरों ने पीठ को घायल किया जब भी तभी देखा- 'सलिल' पर दोस्तों के अनगिनत अहसान हैं प्यारे.. जो दाना होने का दावा रहा करता हमेशा से. 'सलिल' से ज्यादा कोई भी नहीं नादान है प्यारे.. ********************************

मुक्तिका: खुशबू --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका खुशबू संजीव 'सलिल' कहीं है प्यार की खुशबू, कहीं तकरार की खुशबू.. कभी इंकार की खुशबू, कभी इकरार की खुशबू.. सभी खुशबू के दीवाने हुए, पीछे रहूँ क्यों मैं? मुझे तो भा रही है यार के दीदार की खुशबू.. सभी कहते न लेकिन चाहता मैं ठीक हो जाऊँ. उन्हें अच्छी लगे है दिल के इस बीमार की खुशबू. तितलियाँ फूल पर झूमीं, भ्रमर यह देखकर बोला. कभी मुझको भी लेने दो दिले-गुलज़ार की खुशबू. 'सलिल' थम-रुक न झुक-चुक, हौसला रख हार को ले जीत. रहे हर गीत में मन-मीत के सिंगार की खुशबू.. ****************

गीतिका: तितलियाँ --संजीव 'सलिल'

गीतिका तितलियाँ संजीव 'सलिल' * यादों की बारात तितलियाँ. कुदरत की सौगात तितलियाँ.. बिरले जिनके कद्रदान हैं. दर्द भरे नग्मात तितलियाँ.. नाच रहीं हैं ये बिटियों सी शोख-जवां ज़ज्बात तितलियाँ.. बद से बदतर होते जाते. जो, हैं वे हालात तितलियाँ.. कली-कली का रस लेती पर करें न धोखा-घात तितलियाँ.. हिल-मिल रहतीं नहीं जानतीं क्या हैं शाह औ' मात तितलियाँ.. 'सलिल' भरोसा कर ले इन पर हुईं न आदम-जात तितलियाँ.. ********************************* Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com