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हास्य कुण्डली: साली महिमा संजीव 'सलिल'

हास्य कुण्डली: साली महिमा संजीव 'सलिल' * साली जी गुणवान हैं, जीजा जी हैं फैन.. साली जी रस-खान हैं, जीजा सिर्फ कुनैन.. जीजा सिर्फ कुनैन, फ़िदा हैं जीजी जी पर. सुबह-शाम करते सलाम उनको जी-जी कर.. बीबी जी पायी हैं मधु-रस की प्याली जी. बोनस में स्नेह लुटाती हैं साली जी. * साली की महिमा बड़ी, कभी न भूलें आप. हरि के पहले कीजिये साली जी का जाप.. साली जी का जाप करें उपवासे रहकर. बीबी रहे प्रसन्न, भाव-सलिला में बहकर.. सुने प्रार्थना बीबी, दस दिश हो खुशहाली.. सुने वंदना जिस जीजा से प्रतिदिन साली. * जिसकी साली हो नहीं, उसका चैन हराम. नीरस हो जीवन सकल, बिगड़ें सारे काम.. बिगड़ें सारे काम, रहें गृह लक्ष्मी गुमसुम. बिन संज्ञा के सर्वनाम नाकारा हो तुम. कहे 'सलिल' साली-वंदन से  किस्मत चमकी. उसका गृह हो स्वर्ग, खूब हो साली जिसकी.. *******

'बड़ा दिन' --संजीव 'सलिल'

'बड़ा दिन' संजीव 'सलिल' हम ऐसा कुछ काम कर सकें हर दिन रहे बड़ा दिन अपना. बनें सहायक नित्य किसी के- पूरा करदें उसका सपना..... * केवल खुद के लिए न जीकर कुछ पल औरों के हित जी लें. कुछ अमृत दे बाँट, और खुद कभी हलाहल थोडा पी लें. बिना हलाहल पान किये, क्या कोई शिवशंकर हो सकता? बिना बहाए स्वेद धरा पर क्या कोई फसलें बो सकता? दिनकर को सब पूज रहे पर किसने चाहा जलना-तपना? हम ऐसा कुछ काम कर सकें हर दिन रहे बड़ा दिन अपना..... * निज निष्ठा की सूली पर चढ़, जो कुरीत से लड़े निरंतर, तन पर कीलें ठुकवा ले पर- न हो असत के सम्मुख नत-शिर. करे क्षमा जो प्रतिघातों को रख सद्भाव सदा निज मन में. बिना स्वार्थ उपहार बाँटता- फिरे नगर में, डगर- विजन में. उस ईसा की, उस संता की- 'सलिल' सीख ले माला जपना. हम ऐसा कुछ काम कर सकें हर दिन रहे बड़ा दिन अपना..... * जब दाना चक्की में पिसता, आटा बनता, क्षुधा मिटाता. चक्की चले समय की प्रति पल नादां पिसने से घबराता. स्नेह-साधना कर निज प्रतिभा- सूरज से कर जग उजियारा. देश, धर्म, या ज...

स्मृति दीर्घा: संजीव 'सलिल'

स्मृति दीर्घा: संजीव 'सलिल' * स्मृतियों के वातायन से, झाँक रहे हैं लोग... * पाला-पोसा खड़ा कर दिया, बिदा हो गए मौन. मुझमें छिपे हुए हुए है, जैसे भोजन में हो नौन.. चाहा रोक न पाया उनको, खोया है दुर्योग... * ठोंक-ठोंक कर खोट निकली, बना दिया इंसान. शत वन्दन उनको, दी सीख 'न कर मूरख अभिमान'. पत्थर परस करे पारस का, सुखमय है संयोग... * टाँग मार कर कभी गिराया, छुरा पीठ में भोंक. जिनने अपना धर्म निभाया, उन्नति पथ को रोक. उन का आभारी, बचाव के सीखे तभी प्रयोग... * मुझ अपूर्ण को पूर्ण बनाने, आई तज घर-द्वार. कैसे बिसराऊँ मैं उनको, वे मेरी सरकार. मुझसे मुझको ले मुझको दे, मिटा रहीं हर सोग... * बिन शर्तों के नाते जोड़े, दिया प्यार निष्काम. मित्र-सखा मेरे जो उनको सौ-सौ बार सलाम. दुःख ले, सुख दे, सदा मिटाए मम मानस के रोग... * ममता-वात्सल्य के पल, दे नव पीढी ने नित्य. मुझे बताया नव रचना से थका न अभी अनित्य. 'सलिल' अशुभ पर जयी सदा शुभ, दे तू भी निज योग... * स्मृति-दीर्घा में आ-जाकर, गया पीर सब भूल. यात्रा पूर्ण, नयी यात्रा में साथ फूल कुछ...