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क्यों यूँही---ग़ज़ल

लोग कहते हैं क्यों यूँही सिर खपाता हूँ । गीत गाता व्यर्थ ही क्यों गुनगुनाता हूँ । गीत ही है ज़िंदगी ,मेरे लिए ऐ दोस्त, ज़िंदगी जीता हूँ में तो गुनगुनाता हूँ। जाने कितने गम ज़माना लिए फिरता है, गीत गाकर में वही तुमको सुनाता हूँ। त्रस्त जीवन है यहाँ हर खासो -आम का , इसलिए जन-जन की बातें कहता जाता हूँ। यदि न गायें गुनगुनाएं क्या करें फ़िर हम, या तो तुम मुझको कहो ,या में बताता हूँ। हो रहीं क्यों जहाँ में ये ख्वारियाँ ,रुस्वाइयां , डरते हो तुम किंतु में तो कह सुनाता हूँ। कौन ढाए है कहर हर खासो-आम पर, श्याम ,तुम कहते नहीं पर मैं तो गाता हूँ।।

प्यार की भी एक मर्यादा हो

भावुकता में न बहकें कुलवंत हैप्पी क्या हुआ रोशनी? तुम उदास क्यों हो? कुछ नहीं रोहिणी...रोशनी मुझसे तो झूठ मत बोलो। मैं तुम्हारी सहेली हूँ, तुम्हारी रग-रग से वाकिफ हूँ, तुम मुझसे कुछ छुपा रही हो। बोला न नहीं, कुछ भी कहो रोशनी तुम मुझे कुछ छुपा रही हो। बोलो न क्या बात हुई, कहते हैं दुख बाँटने से कम होता है और खुशियाँ बाँटने से बढ़ती हैं। तुम्हें पता है न रोहित के बारे में? हाँ तुम दोनों का प्रेम प्रसंग काफी चर्चा में है। क्या झगड़ा हो गया उससे। प्यार में रूठना-मनाना तो लगा ही रहता है। जिन्दगी में सुख-दुःख दोनों होते हैं। नहीं रोहिणी, बात वह नहीं। कल रोहित और मेरे बीच शुरू हुई तकरार ने एक बड़े झगड़े का रूप ले लिया।हुआ यह कि कल मैं और रोहित फिल्म देखने गए थे। फिल्म देखकर हम जब थिएटर से बाहर निकले तो रोहित ने मुझे कहा कि घर में बहाना बनाकर एक दिन के लिए उसके घर जाऊँ क्योंकि उसके माता-पिता बाहर जा रहे हैं। मैंने उसको मना कर दिया, जिससे वो चिढ़ गया और कहने लगा क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करतीं, तो मैंने भी कह दिया क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करते। वो शारीरिक संबंध बनाने के लिए पिछले कई दिनों से दबाव ड...
गीत चलो हम सूरज उगायें आचार्य संजीव 'सलिल' सघन तम से क्यों डरें हम? भीत होकर क्यों मरें हम? मरुस्थल भी जी उठेंगे- हरीतिमा मिल हम उगायें... विमल जल की सुनें कल-कल। भुला दें स्वार्थों की किल-किल। सत्य-शिव-सुन्दर रचें हम- सभी सब के काम आयें... लाये क्या?, ले जायेंगे क्या?, किसी के मन भाएंगे क्या? सोच यह जीवन जियें हम। हाथ-हाथों से मिलाएं... आत्म में विश्वातं देखें। हर जगह परमात्म लेखें। छिपा है कंकर में शंकर। देख हम मस्तक नवायें... तिमिर में दीपक बनेंगे। शून्य में भी सुर सुनेंगे। नाद अनहद गूंजता जो सुन 'सलिल' सबको सुनायें... ****************************
गीत चलो हम सूरज उगायें आचार्य संजीव 'सलिल' चलो! हम सूरज उगाएं सघन तम से क्यों डरें हम? भीत होकर क्यों मरें हम? मरुस्थल भी जी उठेंगे- हरीतिमा मिल हम उगायें... विमल जल की सुनें कल-कल। भुला दें स्वार्थों की किल-किल। सत्य-शिव -सुंदर रचें हम। सभी सब के काम आयें... लाये क्या?, ले जायेंगे क्या?, किसी के मन भाएंगे क्या? सोच यह जीवन जियें हम। हाथ-हाथों से मिलाएं... आत्म में विश्वातं देखें। हर जगह परमात्म लेखें। छिपा है कंकर में शंकर। देख हम मस्तक नवायें... तिमिर में दीपक बनेंगे। शून्य में भी सुनेंगे। नाद अनहद गूंजता जो सुन 'सलिल' सबको सुनायें... **************************