लोग कहते हैं क्यों यूँही सिर खपाता हूँ । गीत गाता व्यर्थ ही क्यों गुनगुनाता हूँ । गीत ही है ज़िंदगी ,मेरे लिए ऐ दोस्त, ज़िंदगी जीता हूँ में तो गुनगुनाता हूँ। जाने कितने गम ज़माना लिए फिरता है, गीत गाकर में वही तुमको सुनाता हूँ। त्रस्त जीवन है यहाँ हर खासो -आम का , इसलिए जन-जन की बातें कहता जाता हूँ। यदि न गायें गुनगुनाएं क्या करें फ़िर हम, या तो तुम मुझको कहो ,या में बताता हूँ। हो रहीं क्यों जहाँ में ये ख्वारियाँ ,रुस्वाइयां , डरते हो तुम किंतु में तो कह सुनाता हूँ। कौन ढाए है कहर हर खासो-आम पर, श्याम ,तुम कहते नहीं पर मैं तो गाता हूँ।।