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कभी खिलाड़ी कभी अनाड़ी

हम पैसे का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार में बरबाद होने देते हैं। हम अरबों डॉलर काला धन स्विस बैंकों में पड़ा रहने देते हैं और वह भी तब जब स्विस इस धन के स्वामित्व के ब्योरे उजागर करने को तैयार हों। हम लाखों लोगों को भूखों मरने देते हैं, जबकि लाखों टन अनाज खुले में सड़ रहा होता है। हम एक ही समय में इतने कुशल रूप से भ्रष्ट और अनाड़ी कैसे हो सकते हैं? भारत में हर चुनाव तीन वादों के आधार पर लड़ा जाता है। पहला - भ्रष्टाचार से लड़ाई और भ्रष्ट को सजा। दूसरा - अर्थव्यवस्था में काले धन की आवाजाही सीमित करना और विदेशों में इसे जहां भी गुपचुप तरीके से जमा किया गया है, वहां से उसे वापस लाना। तीसरा - मुद्रास्फीति से जूझना और महंगाई को नियंत्रित करना ताकि आप और हम हर साल मुद्रास्फीति से हारी हुई लड़ाई लड़ने की बजाय अपने जीवन स्तर के मानकों की रक्षा कर सकें। मजे की बात तो यह है कि ठीक यही वे बिंदु हैं, जिन पर सभी सरकारें विफल रहती हैं। वह इसलिए नहीं विफल रहतीं कि उन्होंने कोई गंभीर प्रयास किया था और अपना लक्ष्य नहीं पा सकीं। वे इसलिए विफल रहती हैं क्योंकि ये वादे कभी पूरे करने के लिए किए ही नहीं...