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मुक्तक : आचर्य सन्जीव 'सलिल'

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ मुक्तक : आचार्य सन्जीव 'सलिल' जो दूर रहते हैं वही तो पास होते हैं. जो हँस रहे, सचमुच वही उदास होते हैं. सब कुछ मिला 'सलिल' जिन्हें अतृप्त हैं वहीं- जो प्यास को लें जीत वे मधुमास होते हैं. ********* पग चल रहे जो वे सफल प्रयास होते हैं न थके रुक-झुककर वही हुलास होते हैं. चीरते जो सघन तिमिर को सतत 'सलिल'- वे दीप ही आशाओं की उजास होते है. ********* जो डिगें न तिल भर वही विश्वास होते हैं. जो साथ न छोडें वही तो खास होते हैं. जो जानते सीमा, 'सलिल' कह रहा है सच देव! वे साधना-साफल्य का इतिहास होते हैं **********

मुक्तक आचार्य संजीव 'सलिल'

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ मुक्तक आचार्य संजीव 'सलिल' राष्ट्र जमीं का महज न टुकडा, यह आस्था-विश्वास हमारा. तीर्थ, धर्म, मंदिर, मस्जिद, मठ, गिरजा, देवालय, गुरुद्वारा. भाषा-भूषा-भेष भिन्न हैं, लेकिन ह्रदय भिन्न मत मानो- कोटि-कोटि हम मात्र एक हैं, 'जय भारत माँ' सबका नारा. ********* सत्ता और सियासत केवल साधन, साध्य न इनको मानो. जनहित-राष्ट्रोत्थान एक ही लक्ष्य अटल अपना पहचानो. . संसद और विधानसभा में वाग्वीर जो पहुँच गए हैं- ठुकरा उनको, जन-सेवक चुन, जनगण की जय निश्चय जानो.. ********** देव, खुदा, रब, गौड, ईश्वर, गुरु, ऋषि भारत की संतान. भारत जग में सबसे ज्यादा पावन, सबसे अधिक महान. मंत्र, ऋचाएँ, श्लोक, आरती, आयत, प्रेयर औ' अरदास. वन्दन-अर्चन करें राष्ट्र का, 'सलिल' सतत का र्गौरव गान. ********* संसद मंदिर लोकतंत्र का, हुल्लड़ जनगण का उपहास. चला गोलियां मानव-द्रोही फैलाते नृशंस संत्रास. मूक रहे गर इन्हें न रोका, तो अपराधी हम होंगे- 'सलिल' सत्य यह, क्षमा न हमको देगा किंचित भी इतिहास. *********** 'बाजी लगा जान की, रोको आतंकी-हत्यारों को. असफल हुआ स...

एक मुक्तक : आचार्य संजीव 'सलिल'

देश इष्ट ईमान धर्म रब गॉड खुदा ईश्वर है अपना। पथ पग पथिक लक्ष्य साधन यह साध्य साधना सच औ' सपना।। श्वास-आस परिहास हर्ष दुःख मिलन-विरह वात्सल्य भक्ति भी- देश-प्रेम को नाप सके जो बना न 'सलिल' जगत में नपना ।। **********************************************

मुक्तक : आचार्य संजीव 'सलिल'

सर को कलम कर लें भले, सरकश रहें हम. सजदा वहीं करेंगे, जहाँ आँख भी हो नम. उलझे रहो तुम घुंघरुओं, में सुनते रहो छम. हमको है ये मालूम,'सलिल'कम नहीं हैं गम.

मुक्तक -- आचार्य संजीव 'सलिल'

पुस्तकें मिलने-मिलाने का बहाना हो गयीं. आए कासिद या न आए वो फसाना हो गयीं. दूरदर्शन या कि अंतरजाल में दूरी 'सलिल'- जो चली पुस्तक लिए वो ख़ुद निशाना हो गयी. ******************************************* हुस्न-ओ-इश्क की बातें न करो ऐ जानम!. ताज में अब न मोहब्बत के फूल खिलते हैं. बोलते बम रहे शिव जी के भक्त आज तलक- ताज में आजकल शव और बम ही मिलते हैं. ******************************************* बहाते हैं जो लहू रोज़ बेकसूरों का. लहू उनका भी रोज नालियों में बहता है. जो टूटता है उसे फ़िर बना लेता है 'सलिल'- जालिमों का कभी नामो-निशान न रहता है. *******************************************
मुक्तक जो दूर रहते हैं वही तो पास होते हैं. जो हँस रहे, सचमुच वही उदास होते हैं. सब कुछ मिला 'सलिल' जिन्हें अतृप्त हैं वहीं- जो प्यास को लें जीत वे मधुमास होते हैं. पग चल रहे जो वे सफल प्रयास होते हैं न थके रुक-झुककर वही हुलास होते हैं। चीरते जो सघन तिमिर को सतत 'सलिल'- वे दीप ही आशाओं की उजास होते है। जो डिगें न तिल भर वही विश्वास होते हैं. जो साथ न छोडें वही तो खास होते हैं. जो जानते सीमा, 'सलिल' कह रहा है सच देव! वे साधना-साफल्य का इतिहास होते हैं *********************************