वेद प्रताप वैदिक अदालत को बिनायक सेन के बारे में जितनी बातें मालूम पड़ी हैं, वे सब ऊंट के मुंह में जीरे के समान हो सकती हैं। असली बातों तक वे बेचारे पुलिसवाले क्या पहुंचेंगे, जो इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट को आईएसआई समझ लेते हैं। वे गुस्से से लबालब हों तो हैरत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि माओवादी हिंसा में वे ही मारे जाते हैं। हमारे गालबजाऊ बुद्धिजीवी तो उन्हें मच्छर बराबर भी नहीं समझते। डॉ बिनायक सेन को लेकर देश का अंग्रेजी मीडिया और हमारे कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी जिस तरह आपा खो रहे हैं, उसे देखकर देश के लोग दंग हैं। इतना हंगामा तो प्रज्ञा ठाकुर वगैरह को लेकर हमारे तथाकथित राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी तत्वों ने भी नहीं मचाया। वामपंथियों ने आरएसएस को भी मात कर दिया। आरएसएस ने जरा भी देर नहीं लगाई और ‘भगवा आतंकवाद’ की भत्र्सना कर दी। अपने आपको हिंसक गतिविधियों का घोर विरोधी घोषित कर दिया। ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द ही मीडिया से गायब हो गया। लेकिन बिनायक सेन का झंडा उठाने वाले एक भी संगठन या व्यक्ति ने अभी तक माओवादी हिंसा के खिलाफ अपना मुंह तक नहीं खोला। क्या यह माना जाए कि माओवादियों द्वारा मारे जा रहे स...