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कॉमरेडों का फिजूल रोदन

वेद प्रताप वैदिक अदालत को बिनायक सेन के बारे में जितनी बातें मालूम पड़ी हैं, वे सब ऊंट के मुंह में जीरे के समान हो सकती हैं। असली बातों तक वे बेचारे पुलिसवाले क्या पहुंचेंगे, जो इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट को आईएसआई समझ लेते हैं। वे गुस्से से लबालब हों तो हैरत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि माओवादी हिंसा में वे ही मारे जाते हैं। हमारे गालबजाऊ बुद्धिजीवी तो उन्हें मच्छर बराबर भी नहीं समझते। डॉ बिनायक सेन को लेकर देश का अंग्रेजी मीडिया और हमारे कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी जिस तरह आपा खो रहे हैं, उसे देखकर देश के लोग दंग हैं। इतना हंगामा तो प्रज्ञा ठाकुर वगैरह को लेकर हमारे तथाकथित राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी तत्वों ने भी नहीं मचाया। वामपंथियों ने आरएसएस को भी मात कर दिया। आरएसएस ने जरा भी देर नहीं लगाई और ‘भगवा आतंकवाद’ की भत्र्सना कर दी। अपने आपको हिंसक गतिविधियों का घोर विरोधी घोषित कर दिया। ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द ही मीडिया से गायब हो गया। लेकिन बिनायक सेन का झंडा उठाने वाले एक भी संगठन या व्यक्ति ने अभी तक माओवादी हिंसा के खिलाफ अपना मुंह तक नहीं खोला। क्या यह माना जाए कि माओवादियों द्वारा मारे जा रहे स...

वेद प्रताप वैदिक जी का अभियान

फतवों से क्या हासिल?

वेद प्रताप वैदिक  दारुल उलूम के जो दो-तीन ताजातरीन फतवे इधर विवादास्पद हो गए हैं, क्या वे इस लायक हैं कि उन पर ध्यान दिया जाए? जिन फतवों पर खुद इस्लामी लोग कन्नी काट रहे हैं और उर्दू अखबार जिनका मजाक उड़ा रहे हैं, उनका आम लोगों से क्या लेना-देना? ऐसे फतवों पर कुछ लिखा या बोला क्यों जाए? यह सवाल मोटे तौर पर सही मालूम पड़ता है, लेकिन जवाबी सवाल यह भी है कि हमारा मुस्लिम समाज बड़े भारतीय समाज का अभिन्न अंग है या नहीं? कोई ऐसी बात जिससे देश की 15-20 प्रतिशत आबादी गुमराह होती हो या पसोपेश में पड़ती हो या उसे नुकसान पहुंचता हो, उस पर मौन रहना कहां तक उचित है? और यह मामला सिर्फ मुसलमानों तक सीमित नहीं है। जैसे फतवे दारुल उलूम या मिस्र के अल-अजहर विश्वविद्यालय से जारी होते हैं, वैसे ही धर्मादेश रोम से पोप जारी करते हैं। हिंदू और सिख मठाधीश भी किसी से पीछे नहीं हैं। जहां-जहां धर्म संगठित होता है, वह राज्य से भी ज्यादा राजनीति करता है। उसकी क्रूरता अपरंपार होती है। राज्य तो घोर अपराधी को सिर्फ फांसी पर लटकाता है, लेकिन धर्म सती को जिंदा जलाता है, ‘अपराधी की हत्या पत्थर मार-मारकर करता...