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Showing posts with the label कबीरा-नाद

‘समर्थन’ और ‘विरोध’ का सीरियल

श्रवण गर्ग Sunday, July 05, 2009 सरकारों द्वारा की जाने वाली घोषणाओं को लेकर विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएं स्टाक माल की तरह तैयार रहती हैं। आम जनता को भी पूरा आभास रहता है कि पक्ष और विपक्ष के ऊंट किस करवट बैठने वाले हैं। ममता बनर्जी द्वारा शुक्रवार को लोकसभा में पेश किए गए रेल बजट को अगर विपक्षी दलों ने सतही, निराशाजनक और परिकथाओं वाला और कांग्रेसी खेमों ने प्रगतिशील, शानदार और व्यापक समझ वाला निरूपित किया तो इस पर बहुत ज्यादा आश्चर्य व्यक्त नहीं किया जाना चाहिए। कल (सोमवार) को वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी द्वारा पेश किए जाने वाले वर्ष 2009-10 के बजट को लेकर भी कुछ इसी तरह की प्रतिक्रियाओं का इंतजार किया जा सकता है। यूपीए की सरकार पांच वर्षो तक सत्ता में रहने वाली है और हर साल ऐसे ही बजट पेश होंगे और फिर ऐसी ही प्रतिक्रियाएं देखने-पढ़ने को मिलेंगी। जो लोग सरकार में होते हैं वे अपनी हर घोषणा को आम जनता के हित में और विकासोन्मुखी बताते हैं और जो विपक्ष मंे होते हैं ठीक उसके विपरीत। प्रतिक्रियाओं का यह अंतहीन सीरियल पहले आम चुनाव के बाद से ही लगातार चल रहा है। यही विपक्ष...

कनिष्क कश्यप: क्यों उठ रहे मेरे ब्लॉग पर सवाल ?

मैंने जैसे हीं अपने ब्लॉग को एक सार्वजनिक स्वरुप दिया , मेरे अन्य मित्रवत व्यवहार करने वालो ने मेरे नक्से कदम पे चलते हुए , वही किया जो मैंने ! परन्तु मेरी और उंगली उठाने से बाज़ नही आए। उनका मानना है कि मैं अपने उद्देश्य को तो कुछ और बता रखा है , और ब्लॉग पर छप कुछ और रहा । मैं पूछता हूँ की अपनी शादी की सी डी बना कर , स्वयं को मुख्य किरदार निभाते हुए देखना , बहुत सुखदायक तो नही , पर अच्छा अवश्य लगता है। स्वयं को नायक की तरह , कैमरे के फोकस में देखना एक पल के लिए सुभाष घई की याद तो दिला हीं देता है। । अ़ब आपने गाँव में होली गाते तो देखा हीं होगा .... एक व्यक्ति पंक्तिओं को गाता हैं और पीछे -पीछे सब उसी को ढोलक और झाल की थाप पर दुहराते हैं। कोई मतभेद नही होता , कोई अलग सुर में नही गाता ..सब एक की सुनते हैं और गाते हैं ।मेरे (उस मित्र )मित्रों ने अपने ब्लॉग का उद्देश्य तो अवश्य बताया , पर उसका अर्थ ख़ुद नही समझ पाए ... उनके शब्दों में "दरअसल हमारा उद्देश्य है " भारतवर्ष में समसामयिक राजनैतिक और सामाजिक मुद्दों पर सही वैचारिक दृष्टिकोण , जिसे हम भारतीय नजरिया भी कहते हैं , प्रस्...

हाँ तो भाई साहब ...ब्राहमणवाद को पहचानिये ...

टिप्पणी पे की गयी टिपण्णी , पर टिप्पणी ................................. आपका कहना लाज़मी है .. मैंने तो पहले हीं ज़िक्र कर दिया की सवाल अगर ब्राह्मणों ने खड़ा किया , या ऐसी मानसिकता ने , तो ज़वाब भी तो वहीँ बने। जहाँ तक बात है साँप की दूध पीने की , तो वह सत्य है सभी के लिए ..... साँप ब्राह्मणों के घर में हीं दूध नही पीते । पता नही आप किस आधार पर गाँधी की हत्या , इंदिरा और राजीव की हत्या ब्राह्मण्वादि सोच का प्रतिफल मानते हैं। अगर सच में ऐसा है तो आपका विश्लेषण जग जाहिर होना चाहिए। मुझे तो लगता है की , गाँधी की हत्या कर गाँधी को महान बना दिया गया । वरना उनके काबिलियत पे संदेह बरक़रार रह जाता । गाँधी तो स्वयं , हार चुके थे , उस निहत्थे बुढे गाँधी पे गोली खर्च करने की क्या आवश्यकता थी । उनकी सजा उनकी ज़िन्दगी थी । गाँधी हमेशा हीं अंग्रेजियत के दुश्मन थे अंग्रेजों के नहीं , और इसके पलट में नेहरू अंग्रेजों के दुश्मन थे , अंग्रेजि़त के नही...

ब्राह्मण्वादि होना तो जीने की अदा है, तबियत हो तो अपना लीजिये

सुमन जी के लेख " आजाद भारत में ब्राहमणवाद का कफस " पढ़ा। लेख को लेकर काफी प्रतिक्रिया हुई और यह एक गंभीर चर्चा का विषय बन गया ... ऐसा कह कर मैं इस मुद्दे को वो तवज्जो नही देना चाहता। पहले मैं सुमन जी से ये कहना चाहता हूँ की , अछे और बुरे का होना , किसी जाती , धर्मं या संप्रदाय की बपौती नही है। पर इस बात को कुछ हद तक स्वीकार जा सकता है की मानवीय गुण और धर्म संस्कार से प्रभावित अवश्य होते हैं । अब जो जिस लायक है , उसे उसका अधिकार तो मिलना चाहिए । पूजा सूर्य की होती है , सितारों की नही ! पूजी तुलसी जाती है , बनोल नही ! कहने का तात्पर्य ये है की , गुण - और गुणी सर्वदा पूजनीय होतें हैं। इससे पहले की आगे की बात की जाए , सुमन जी के लेख पर नज़र डालें ... http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/2009/05/loksangharsha-1.html पहले मैं " ब्राहमण " शब्द के साथ किसी " वाद " जैसी निकृष्ट शब्दावली के प्रयोग का पक्षधर नही हूँ...

सपनो को दारगाह में अरसे बीते .........

तेरे ग़म के पनाह में अर्से बिते आरजू के गुनाह में अर्से बिते अब तो तन्हाई है पैरहम दिल की सपनों को दारगाह में अर्से बिते कुछ तो बिते हुए वक्त का तकाज़ा है कुछ तो राहों ने शौकया नवाजा है जब से सपनों में तेरा आना छुटा नींद से मुलाक़ात के अर्से बिते बिते हुए लम्हों से शिकवा नहीं मिल जाए थोड़ा चैन ये रवायत नही मेरे टुकडो में अपनी खुशी ढूँढो ज़रा बिखरे इन्हे फुटपाथ पे अर्से बिते .......

"कबीरा खड़ा बाज़ार में" का उद्देश्य एवं अर्थ ....

कबीरा शब्द अपने आप में एक व्यापक अर्थ समेटे हुए है । मेरे ब्लॉग का नाम कबीरा खड़ा बाज़ार में रखने के पिछे एक बड़ा उद्देश्य है। "कबीर " मात्र एक संत का नाम नही , यह अपने आप में एक बड़ी अवधारणा है । आपका नाम जो भी हो, आप अपने आप में एक पुरी प्रक्रिया हैं। कनिष्क , यानि मैं , एक पुरी प्रक्रिया है , किसी को किसी जैसा बनने के लिए उस पुरी प्रक्रिया से गुजरना होगा। ... "कबीरा " शब्द मात्र से हीं जो छवि उभरती है वह किसी आन्दोलन को प्रतिबिंबित करती है । "कबीर" ने जीवन पर्यंत तात्कालिक सामाजिक बुराइयों पे बड़े सुलझे ढंग से प्रहार किया। कबीर स्वयं में एक क्रांति थे । जाती धर्म और वर्ग से ऊपर उठकर उन्होंने सामान रूप से सभी पर कटाक्ष किया। कबीर "संचार "या आप जनसंचार कहें , की आत्मा हैं। "जनसंचार का काम सूचना देना "बड़ी हीं तुक्ष मानसिकता को दर्शाता है । "सुचना देना "और "ज्ञान देना " दोनों में बड़ा हीं अन्तर है। परन्तु आज हमारा बौधिक स्तर इतना निक्रिष्ट हो गया है की ये फर्क समझ में नही आता। समझ में जिसे आता भी है तो वो इसके व्यापक ...