भोपाल गैस त्रासदी : एक शब्द चित्र डॉ. कमल जौहरी डोगरा, भोपाल * याद है उन्नीस सौ चौरासी दो दिसंबर की वह भीषण रात और तीन दिसम्बर का धुंधला सवेरा बीत गए जिसके छब्बीस साल. शीत ऋतु की काली रात वह गैस त्रासदी के लिये कुख्यात. बन गयी बिकाऊ खबर विश्व-नक़्शे पर उभर आया भोपाल. सहानुभूति-सहायता का समुद्र लहराया पत्रकारों, छायाकारों की भारी भीड़ नेताओं की दौड़-भाग, गहमा-गहमी सब उमड़ आये भोपाल में बादलों से. कुछ देर में छँट गए थे बादल बिना बरसे उड़ गए हवा में शीघ्र रह गयी जनता कराहती, दुःख भोगती अनाथ बच्चे, विधवा नारियाँ बिसूरती. पुरुष जो बच गए, पुरुषार्थ से हीन आजीविका कमाने में असमर्थ वे परिवार बिखरे, कुछ के लापता सदस्य जो आज तक गुमशुदा सूची में हैं. कैसी घोर विपत्ति की थी रात? सड़कों पर भीड़, भागता जन समूह कहीं भी, कैसे भी भोपाल से दूर भाग जाने को व्याकुल. पर दिशाहीन इन मानवों का दिशादर्शन करनेवाली वाणी मौन थी. सरकारी घोषणा न थी कहीं कोई भेड़ों सी भागती जनता थी सब कहीं. स्मरण है ह...