मिटटी के भाव ..अपनी जिंदगी गवा रहे है॥ इस पवित्र पावन धरती से..रूठ के जा रहे है॥ क्यो करते है आत्म ह्त्या॥ क्या जीने का हक़ नही है॥ मरने के बाद जीने की ॥ तरकीब बता रहे है॥ मिटटी के भाव ..अपनी जिंदगी गवा रहे है॥ इस पवित्र पावन धरती से॥रूठ के जा रहे है॥ क्यो करता है प्रेम धोखा॥ क्यो जलता है परवाना॥ भरी बाज़ार में ॥ मारा जाता है दीवाना॥ अपनी कहानी छोड़ के॥ औरो की बता रहे है... मिटटी के भाव ..अपनी जिंदगी गवा रहे है॥ इस पवित्र पावन धरती से॥रूठ के जा रहे है॥ क्यो टूटता है प्रेम .मरते है प्रेमी घुट के। दोनों की खिल्लिया उडाते है लोग जुट के॥ अपनी तो पोल लोग ॥ सबसे छुपा रहे है॥ मिटटी के भाव ..अपनी जिंदगी गवा रहे है॥ इस पवित्र पावन धरती से..रूठ के जा रहे है॥