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Showing posts with the label उन्नति

मेरे अच्छे दोस्त जॉर्ज

जॉर्ज फर्नाडीज के लिए मेरे दिल में सदैव एक स्थान रहा है। मैं उन्हें पिछले करीब 40 सालों से अलग-अलग रूपों में जानता हूं। उनमें वह सबकुछ था, जो मुझमें नहीं था। अपनी पहली ही मुलाकात के दौरान मैंने उन्हें ऐसे आकर्षक गठीले युवक के रूप में पाया जिसमें जीवन जीने का उत्साह कूट-कूटकर भरा हुआ था। इसी वजह से कई सुंदर महिलाएं उनके प्रति आकर्षित हुईं। उधर मैं एक थुलथुल सरदार। जॉर्ज को मैंने पहली बार तब देखा था, जब वे ग्रीष्मकाल की एक तपती दोपहरी में काला घोड़ा चौक स्थित एक छोटे से मंच पर खड़े होकर मुंबई के सैकड़ों कैब चालकों को अपने हक के वास्ते संघर्ष करने के लिए प्रेरित कर रहे थे। उसी शाम को मैं उनसे एक कॉकटेल पार्टी में मिला। उस पार्टी में वे आभूषणों से लदे मुंबई के भद्रजनों के आकर्षण का केंद्र बन गए थे। वे उन लोगों से उतनी ही सहजता से बातचीत कर रहे थे, जितनी सहजता से वे दोपहर में टैक्सी ड्राइवरों को संघर्ष के लिए ललकार रहे थे। हम दोनों जो एक बात साझा करते थे, वह यह थी कि हमें सभी धर्मो से चिढ़ थी। वे कैथोलिक धर्म में पैदा हुए थे, लेकिन उसका अनुसरण उन्होंने कभी नहीं किया। मेरा उनसे नाता थोड़े सम...

निज भाषा उन्नति अहै ----डा श्याम गुप्त की कविता ...

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे ओ भारत के दुर्वल मानव , दलित आत्मा के पुतले | मानस सुत रे अंगरेजों के , अंगरेजी के कठपुतले | पढ़कर चार विदेशी अक्षर , तुम अपने को भूल चले | पतन देख कर तेरे मन का , मेरे मन में शूल चले | देख बाह्य सौन्दर्य , विदेशी - भाषा के गुणगाते हो | उसे उच्चभाषाकहने में, बिल्कुल नहीं लजाते हो | जीभ नहीं गल गिरती है , हा ! कैसे उसे चलाते हो | आर महा आर्श्चय , देश द्रोही - क्यों नहीं कहाते हो ! तड़प रही है बिकल आत्मा , भारत की , कहती निज जन से | हमें गुलाम बनाने वाले , अरे ! छुड़ाओ इस बंधन से | यह भाषा , इसकी सभ्यता , समझो भारत का घुन है | इसे देख मेरी मानवता , कहती यों अपना सिर धुन है | अंगरेजी कुत्सित छायाएं , जो भारत से नहीं हटेंगी | समझें आने वाली पीढी , कभी न हमको माफ़ करेंगी | अरे ! मूढ़ , मति अंध , राष्ट्र द्रोही - न अंत में जाओ भूल | ' निज भाषा उन्नति अहै - सब उन्नति कौ मूल ' ||