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कट्टरताओं मत बाँटो देश ---- मिथिलेश

नया युग वैज्ञानिक अध्यात्म का है । इसमें किसी तरह की कट्टरता मूढता अथवा पागलपन है। मूढताए अथवा अंधताये धर्म की हो या जाति की अथवा फिर भाषा या क्षेत्र की पूरी तरह से बेईमानी हो चुकी है । लेकिन हमारें यहां की राजनीति इतनी भ्रष्ट हो गई है कि उन्हे देश को बाँटने के सिवाय कोई और मुद्दा ही नहीं दिखता । कभी वे अलग राज्य के नाम पर राजनीति कर रहे हैं तो कभी जाति और धर्म के नाम पर । जिस दश में लोग बिना खाए सो जा रहे हो , कुपोषण का शिकार हो रहें हो , लड़किया घर से निकलने पर डर रही हो उस देश में ऐसे मुद्दों पर राजनीति करना मात्र मूर्खता ही कही जा सकती है । आज से पाँच-छह सौ साल पहले यूरोप जिस अंधविश्वास दंभ एंव धार्मिक बर्बरता के युग में जी रहा था, उस युग में आज अपने देश को घसीटने की पूरी कोशिश की जा रही है जो किसी भी तरह से उचित नही है। जो मूर्खतायें अब तक हमारे निजी जीवन का नाश कर रही थी वही अब देशव्यापी प्रागंण में फैलकर हमारी बची-खुची मानवीय संवेदना का ग्रास कर रही है । जिनकें कारण अभी तक हमारे व्यक्तित्व का पतन होता रहा है जो हमारी गुलामी का प्रमुख कारण रही, अब उन्ही के कारण हमारा देश एक बार फ...

मेरी मौत खुशी का वायस होगी ----------मिथिलेश

जिन्दगी जिन्दादिली को जान ए रोशन यहॉं वरना कितने मरते हैं और पैदा होते जाते हैं। क्रान्तिकारी रोशन सिंह का जन्म शाहजहॉंपुर जिले के नबादा ग्राम में हुआ था । यह गांव खुदागंज कस्बे से लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर है। इनके पिता का नाम ठाकुर जंगी सिंह था। इस परिवार पर आर्य समाज का बहुत प्रभाव था। उन दिनों आर्य समाज द्वारा चलाए जा रहे देशहित के कार्यों से ठाकुर साहब का परिवार अछूता ना रहा। श्री जंगी सिंह के चार पुत्र ठाकुर रोशन सिंह, जाखन सिंह, सुखराम सिंह, पीताम्बर तथा दो लड़कियॉं थी । आपका जन्म 22 जनवरी को सन् 1892 को हुआ था। ठाकुर साहब काकोरी काण्ड के क्रान्तिकारियों में आयु में सबस बड़े तथा सबसे अधिक बलवान तथा अचूक निशानेबाज थे । असहयोग आन्दोलन में शाहजहॉंपुर तथा बरेली जिले के ग्रामिण क्षेत्र में उन्होने बड़े उत्साह कार्य किया। उन दिनों बरेली में एक गोली कांड हुआ था जिसमें उन्हें दो वर्ष की बड़ी सजा दी गई । वे उन सच्चे देशभक्तों में थे जिन्होने अपने खून की अन्तिम बूद भी भारत मॉं की भेंट चढ़ा दी । रामप्रसाद बिस्मिल , अशफाक उल्ला खॉं, राजेन्द्र लाहिड़ी की तरह वे भी बहुत साहसी और सच्चे देशभ...

लुप्त होती-- सिर से आँचल व पैरों से पायल--मिथिलेश

बदन से सरकते कपड़े , जी हाँ आजके वर्तमान परिवेश में आपको आसानी से दिख जायेगा । अब ये आपको हर गली नुक्कड़ बाजार हो या शोपिग माल छोटे कपड़ो मे लड़कियां आपको आसानी से दिख जायेंगी । कल तक छोटे कपड़े रैंप पर कैटवाक करती मॉडल्स अपने डिजाइनर्स के कलेक्शन को पेश करने के लिए पहनती थीं लेकिन आजकल ऐसे कपड़े आम शहरी लड़कियाँ भी पहन रही हैं। जो दिखता है वही बिकता है की तर्ज पर अब लड़कियाँ भी बिंदास बाला की छवि में खुद को ढालती जा रही हैं और बेझिझक अपने मांसल सौंदर्य का प्रदर्शन कर लोगों की वाहवाही बटोर रही हैं। और हर जगह कहती फिरती है कि ये हमारा हक है । ठिक है हक और भी तो है तो क्या इस हक की जरुरत ज्यादा है इनकों । ऐसे कपड़ो में घुमती फिरती है और कहती है कि am i looking hot and sexy , और अगर आप ने हाँ कह दिया तो क्या हौसले और भी बुलंद । अभी कुछ दिनों पहले की बात है मै टी वी देख रहा था की अचानक मेरी नजर इड़िया टीवी पर पड़ी और देखा किसी अदालत नामक सीरियल पर पड़ी , जहाँ एक एपिसोड में एक कटघरे में स्वामी बाबा रामदेव थे औत दूसरे कटघरे में बोलीवुड की आइटम गर्ल समंभावना सेठ और कश्मिरा शाह थी । मुद्दा च...

कहां चला राहुल गांधी का जादू?

अनंत विजय डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर ibn7 अब जबकि लोकसभा चुनावों का शोरगुल खत्म हो चुका है, पखवाड़े भर की माथापच्ची के बाद कांग्रेस मंत्री और मंत्रालय तय करने में कामयाबी हासिल कर चुकी है। मंत्री अपने मंत्रालयों के सौ दिन के एजेंडे घोषित करने में जी जान से जुटे हैं। मीडिया के कई हिस्सों में राहुल गांधी के जादू और करिश्मे का कोलाहल भी थोडा़ कम होने लगा है, तो अब वक्त आ गया है कि दो हजार नौ में हुए लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के जादू और करिश्मे की थ्योरी को कसौटी पर कसा जाए। जीत के बाद जब सोनिया गांधी रायबरेली की जनता को धन्यवाद देने अपने लोकसभा क्षेत्र पहुंचीं तो उन्होंने लोकसभा चुनाव में पार्टी की जीत का सेहरा राहुल के सर बांधा। कांग्रेस के रणनीतिकारों की तरफ से लगातार इस बात को प्रचारित प्रसारित किया, करवाया गया कि कांग्रेस को मिली सफलता के पीछे राहुल गांधी के करिश्मे और उनके व्यक्तित्व के जादू का हाथ है। उत्तर प्रदेश में पार्टी को मिली आशातीत सफलता का श्रेय भी राहुल गांधी की रणनीति को दिया गया। मीडिया में ये बात भी आई कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने का फैसला ...

T-20: हारना ही था, आखिर मुगालते कब तक साथ देते...

कैसे गलतफहमियां और अतिआत्मविश्वास टीम इंडिया को ले डूबे, टूर्नामेंट से विदाई का बयास बनें कारणों के विश्लेषण का प्रयास... गलतफहमी नं 1 - हम सबसे बेहतर टी-20 टीम हैं। वास्ताविकता- हां हम सबसे बेहतर टी-20 टीम थे। पिछले कुछ सालों में जब हमने टी-20 वर्ल्डकप जीता था तब, उसके बाद कई टीमों ने हमें कई मौकों पर हराया था। फिर भी हम गलतफहमी का शिकार रहे। गलतफहमी नं 2 - हमें टी-20 का सर्वाधिक अनुभव है। वास्तविकता- पहले टी-20 वर्ल्डकप तक कोई भी टीम ठीकठाक तरीके से इस फार्मेट में खेलने का तरीका नहीं जानती थी। उसके बाद अन्य टीमों ने जहां अपने खेल में काफी सुधार किया वहीं हम लगातार इस मुगालते में रहे कि टी-20 में हम ही सबसे बेहतर हैं। यहां तक की हमने यह भी नहीं देखा कि उसके बाद दो आइपीएल सीजन हो चुके हैं इसमें काफी विदेशी खिलाड़ी खेले हैं। कई विदेशी कोचों ने यहां अनुभव प्राप्त किया है। इस बात तक को नजरअंदाज किया कि इन आइपीएल सीजनों में भारतीयों के समकक्ष ही विदेशी खिलाडि़यों ने जबर्दस्त प्रदर्शन किय है। गलतफहमी नं 3 - टी-20 युवाओं का खेल है। हमारी टीम का औसत आयु सबसे कम है। वास्तविकता- आइपीएल में बुजु...

ईसाईयों पर तालिबान का कहर

आर.एल.फ्रांसिस पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मुवमेन्ट के अध्यक्ष आर एल फ्रांसिस ईसाई मिशनरियों के बीच व्याप्त भेदभाव और कटुता के खिलाफ लगातार अपनी आवाज बुलंद किये हुए हैं. आप उन्हें francispclm@yahoo.com पर संपर्क कर सकते हैं. यह लेख विस्फोट से लिया गया है आप लोगों की इस लेख पर राय आमंत्रित है ! इस महीने की 19 तरीख को पाकिस्तान के कराची शहर में `ईसाइयों की एक बस्ती´ में तालिबान ने इस्लाम के नाम पर नंगा नाच खेला। स्थानीय ईसाइयों द्वारा प्रशासन से अपनी सुरक्षा की मांग को लेकर किये गये शांतिमार्च से बौखलाये तालिबान ने पुन: 21 तरीख को तशीर टाउन में रात के समय हमला बोल दिया और वहशियाना तरीके से लोगों के सामने दो ईसाइयों को मौत के घाट उतार दिया गया और औरतों को बालों से पकड़कर घसीटा गया। धमकी दी गई कि वह `इस्लाम´ ग्रहण करें। तालिबान कराची एवं पूरे सिंध में शरीया लागू करना चाहता है। इस्लाम के नाम पर अस्तित्व में आया पाकिस्तान आज अपने ही फैलाये हुए धार्मिक कट्टरपन के भंवर में फंस गया है। वहां अल्पसंख्यक समुदाय जिस डर और खौफ के साये में जी रहे है उसकी कल्पना से भी रुह कांप जाती है। कट्टरपंथी गुप्रों क...

जनसंघ की नीतियों में बदलाव कर भाजपा की स्थापना के समय इसे धर्मनिरपेक्षता का चोला दिया

कुलदीप शर्मा दैनिक भास्कर और नई दुनिया में काम कर चुके कुलदीप शर्मा भोपाल में रहकर अब स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन करते हैं। फिलहाल पिछले 60 साल की राजनीति पर पुस्तक लेखन में व्यस्त क्या भाजपा का उद्देष्य अब कूेवल सत्ता प्राप्त करना मात्र रह गया है ठीक अटलबिहारी वाजपेयी की तरह जो हमेषा से एकमात्र महत्वाकांक्षा देष का प्रधानमंत्री बनने की पाले रहे थे? यदि इन प्रष्नों का जवाब हां में दिया जाए तो अनेक लोग इससे असहमत होंगे, क्योंकि ऐसा कहने को अधिकांष लोग नहीं पचा पाएंगे मगर यही हकीकत मानी जा सकती है। इस बात को सिद्ध करने के लिए अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। इतना ही नहीं भाजपा की हालिया नीतियों से भी यह जाहिर होता है कि अब उसका ध्येय प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आडवाणी को आसीन करना ही रह गया है, क्योंकि जिस तरह से वाजपेयी की एकमात्र महत्वाकांक्षा देष का प्रधानमंत्री बनने की रही थी और उन्होंने इसके लिए जनसंघ की घोषित नीतियों में बदलाव कर भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के समय इसे धर्मनिरपेक्षता का चोला पहनाया दिया था, जबकि जनसंघ की नीतियों में संभवतः ऐसी कोई प्रतिबद्धता नहीं थी। इसका कारण यही मान...

कुलदीप शर्मा जी का लेख

कुलदीप शर्मा दैनिक भास्कर और नई दुनिया में काम कर चुके कुलदीप शर्मा भोपाल में रहकर अब स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन करते हैं। फिलहाल पिछले 60 साल की राजनीति पर पुस्तक लेखन में व्यस्त. संपर्क- kalkshepee@gmail.com मोबाइल-9424505136 इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद वर्ष 1985 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद कांगे्रस को पूरे देष में न सिर्फ जबर्दस्त बल्कि ऐतिहासिक सफलता मिली और भाजपा को केवल दो सीटों से संतोष करना पड़ा। इतना ही नहीं उस चुनाव में पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष अटलबिहारी वाजपेयी स्वयं ग्वालियर से माधवराव सिंधिया से चुनाव हार गए। उस समय मैं काॅलेज में था और छात्र राजनीति में सक्रिय भी था। जोष ही जोष में अटलबिहारी वाजपेयी को एक लंबा पत्र 19 मार्च 1985 को लिखा कि आपकी पार्टी की ऐसी दुर्दषा क्यों हुई। इस पत्र को लिखकर मैं इस घटना को भूल सा गया कि करीब दो महीने बाद अचानक एक दिन अटलबिहारी वाजपेयी लिखा लिफाफा मिला। मैंने अपने पत्र में जो मुद्दे उठाए थे, एक नेता की तरह उन सभी का जवाब उन्होंने दे दिया था, लेकिन बाद के समय में अपनी नीतियों में व्यापक परिवर्तन भी किया। मेरे द्वारा उठाए गए सभी मुद्...