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लालकृष्ण आडवानी जी कभी प्रधान मंत्री नहीं बन सकते

भारतीय देश के प्रधानमंत्री पद के इतिहास पर नजर डाली ,जो तथ्य सामने आया सभी के सामने रखने की कोशिश कर रहा हूँ..ये कलयुग है और सतयुग हुआ करता था जब राम भगवन सत्ताधारी बने थे तो उसे रामराज कहा जाता था.या यूँ कहे की राम राज कहा जाता है जी हाँ दोस्तों इसे कायनात का करिश्मा कहे या और कुछ की आज भी देश के प्रधानमंत्री पद को राम राज की पदवी से नवाजा जाता है ..ऐसा मुझे लगता है ..आगे आप अपने विचार रख सकते है !!मैन ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्यों की जब देश का प्रथम प्रधानमंत्री हुआ तो उसके नाम में ''र'' या ''म'' शब्द आता था इसके बाद जब भी कोई प्रधानमंत्री बना तो उसके नाम में ''र'' या ''म''जरुर आता था या फिर भगवन की मर्ज़ी कहे बह उसे ही मौका देता था जिसके नाम में ''र'' या ''म'' हो क्यों की ''र'' या ''म'' से आज भी राम राज की उम्मीद की जाती है ...इस अजूबा को एक अपबाद मिला विश्ब प्रताप सिंह के रूप में लेकिन इसे कुदरत का करिश्मा ही कहे की बह केवल कुछ महीने की कुर्सी संभल सके..इसके ...

मांगी किताबें और मिली गालियाँ

छमाही परीक्षा के बाद भी प्रदेश के 20 से ज्यादा जिलों में कई स्कूली बच्चों को किताबें नहीं मिल पाई हैं। इसमें इंदौर सहित संभाग के खरगोन और झाबुआ जिले भी शामिल हैं। 15 अगस्त तक सभी बच्चों को किताबें मिल जाना चाहिए थी लेकिन बीत रहे दिसंबर महीने में भी सैकड़ों बच्चे किताबों से वंचित हैं। नतीजा अर्धवार्षिक के बाद उन्हें बगैर किताबों से वार्षिक परीक्षाओं की तैयारी करना पड़ेगी। पैदा हुए हालात पर आयुक्त राज्य शिक्षा केंद्र ने लापरवाह जिला परियोजना समन्वयकों को फटकार लगाते हुए उन्हें नोटिस जारी कर पूछा है कि क्यों न आपके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। इंदौर सहित प्रदेश के कई जिलों में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य को लेकर शिक्षाधिकारी बेपरवाह हैं। बच्चों के हाथों में किताबें न पहुंच पाने के सवाल पर ज्यादातर अफसर पहली से आठवीं तक की परीक्षाएं लोकल कर दिए जाने का तर्क देकर मामले को हलके तौर पर ले रहे हैं। नियम के मुताबिक हर बच्चे को सरकार की ओर से मिलने वाली नि:शुल्क पाठ्यपुस्तकों का वितरण 15 अगस्त तक हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जिला परियोजना समन्वयक सर्वशिक्षा अभि...

बिहारी अस्मिता का लालू'राग'

बिहारी अस्मिता का लालू'राग' बिहार के नेता इन दिनों बड़े चिंतित हो रहे हैं. उनकी चिंता है कि महाराष्ट्र में गुण्डाराज स्थापित हो गया है. इस गुंडाराज के खिलाफ केन्द्र और राज्य की कांग्रेस सरकार कड़े कदम उठाने में विफल रही है. इसके विरोध में बिहार के अराजक युग के शिल्पकार लालू प्रसाद यादव ने सभी जनप्रतिनिधियों से अपना इस्तीफा देने का आह्वन किया है. लालू की ओर कोरी बिहारी अस्मिता की कवायद में वे भारी न पड़ जाएं इसलिए जद यू के पांच सांसदों ने अपने इस्तीफे लोकसभा महासचिव को सौंप भी दिये हैं. जिसमें प्रभुनाथ िसंह और जार्ज फर्नांडीज भी शामिल हैं.राजनीति में इस तरह ढकोसले होते ही रहते हैं. सवाल तो यह है कि क्या बिहार के सांसदों में सचमुच इतना नैतिक बल है कि वे महाराष्ट्र की कानून व्यवस्था पर सवाल पूछ सकें? यदि कानून और न्याय व्यवस्था के मापदण्ड पर कोई निष्पक्ष निर्णय लिया जाए तो बिहार में राष्ट्रपति शासन या मार्शल ला के अलावा कोई तीसरा विकल्प शेष ही नहीं रह जाता. महाराष्ट्र में अगर गुण्डाराज का प्रभाव छटांकभर है तो बिहार में पसेरी और मन के बटखरे के बिना तौल संभव ही नहीं है. पहले यह देख...