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नवगीत : ओढ़ कुहासे की चादर संजीव वर्मा 'सलिल'

नवगीत :  ओढ़ कुहासे की चादर  संजीव वर्मा 'सलिल' * ओढ़ कुहासे की चादर, धरती लगाती दादी। ऊँघ रहा सतपुडा, लपेटे मटमैली खादी... * सूर्य अंगारों की सिगडी है, ठण्ड भगा ले भैया। श्वास-आस संग उछल-कूदकर नाचो ता-ता थैया। तुहिन कणों को हरित दूब, लगती कोमल गादी... * कुहरा छाया संबंधों पर, रिश्तों की गरमी पर। हुए कठोर आचरण अपने, कुहरा है नरमी पर। बेशरमी नेताओं ने, पहनी-ओढी-लादी... * नैतिकता की गाय काँपती, संयम छत टपके। हार गया श्रम कोशिश कर, कर बार-बार अबके। मूल्यों की ठठरी मरघट तक, ख़ुद ही पहुँचा दी... * भावनाओं को कामनाओं ने, हरदम ही कुचला। संयम-पंकज लालसाओं के पंक-फँसा-फिसला। अपने घर की अपने हाथों कर दी बर्बादी... * बसते-बसते उजड़ी बस्ती, फ़िर-फ़िर बसना है। बस न रहा ख़ुद पर तो, परबस 'सलिल' तरसना है। रसना रस ना ले, लालच ने लज्जा बिकवा दी... * हर 'मावस पश्चात् पूर्णिमा लाती उजियारा। मृतिका दीप काटता तम् की, युग-युग से कारा। तिमिर पिया, दीवाली ने जीवन जय गुंजा दी... *****

मुक्तिका: सच्चा नेह ---संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:                                                                                                                                       सच्चा नेह संजीव 'सलिल' * तुमने मुझसे सच्चा नेह लगाया था. पीट ढिंढोरा जग को व्यर्थ बताया था.. मेरे शक-विश्वास न तुमको ज्ञात तनिक. सत-शिव-सुंदर नहीं पिघलने पाया था.. पूजा क्यों केवल निज हित का हेतु बनी? तुझको भरमाता तेरा ही साया था.. चाँद दिखा आकर्षित तुझको किया तभी गीत चाँदनी का तूने रच-गाया था.. माँगा हिन्दी का, पाया अंग्रेजी का फूल तभी तो पैरों तले दबाया था.. प्रीत अमिय संदेह ज़हर है सच मानो. इसे हृदय में उसको कंठ बसाया था.. जूठा-मैला किया तुम्हींने, निर्मल था व्यथा-कथा को नहीं...

मुक्तिका: फिर ज़मीं पर..... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका: फिर ज़मीं पर..... संजीव 'सलिल' * फिर ज़मीं पर कहीं काफ़िर कहीं क़ादिर क्यों है? फिर ज़मीं पर कहीं नाफ़िर कहीं नादिर क्यों है? * फिर ज़मीं पर कहीं बे-घर कहीं बा-घर क्यों है? फिर ज़मीं पर कहीं नासिख कहीं नाशिर क्यों है? * चाहते हम भी तुम्हें चाहते हो तुम भी हमें. फिर ज़मीं पर कहीं नाज़िल कहीं नाज़िर क्यों है? * कौन किसका है सगा और किसे गैर कहें? फिर ज़मीं पर कहीं ताइर कहीं ताहिर क्यों है? * धूप है, छाँव है, सुख-दुःख है सभी का यक सा. फिर ज़मीं पर कहीं तालिब कहीं ताजिर क्यों है? * ज़र्रे -ज़र्रे में बसा वो न 'सलिल' दिखता है. फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं  मंदिर क्यों है? * पानी जन आँख में बाकी न 'सलिल' सूख गया. फिर ज़मीं पर कहीं सलिला कहीं सागर क्यों है? * -- दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम कुछ शब्दों के अर्थ : काफ़िर = नास्तिक, धर्मद्वेषी, क़ादिर = समर्थ, ईश्वर, नाफ़िर = घृणा करनेवाला, नादिर = श्रेष्ठ, अद्भुत, बे-घर = आवासहीन, बा-घर = घर वाला, जिसके पास घर हो, नासिख = लिखनेवाला,  नाशिर = प्रकाशित करनेवाला, नाज़िल = मुसीबत, नाज़ि...

मुक्तिका : संजीव 'सलिल'

मुक्तिका : संजीव 'सलिल' * काम रहजन का करे नाम से रहबर क्यों है? मौला इस देश का नेता हुआ कायर क्यों है?? खोल अखबार- खबर सच से बेखबर क्यों है? फिर जमीं पर कहीं मस्जिद, कहीं मंदर क्यों है? जो है खूनी उकाब उसको अता की ताकत. भोला-मासूम परिंदा नहीं जबर क्यों है?? जिसने पैदा किया तुझको तेरी औलादों को. आदमी के लिए औरत रही चौसर क्यों है?? एक ही माँ ने हमें दूध पिलाकर पाला. पीठ हिन्दोस्तां की पाक का खंजर क्यों है?? लाख खाता है कसम रोज वफ़ा की आदम. कर न सका आज तलक बोल तो जौहर क्यों है?? पेट पलता है तेरा और मेरा भी जिससे- कामचोरी की जगह, बोल ये दफ्तर क्यों है?? ना वचन सात, ना फेरे ही लुभाते तुझको. राह देखा किया जिसकी तू, वो कोहबर क्यों है?? हर बशर चाहता औरत तो पाक-साफ़ रहे. बाँह में इसको लिए, चाह में गौहर क्यों है?? पढ़ के पुस्तक कोई नादान से दाना न हुआ. ढाई आखर न पढ़े, पढ़ के निरक्षर क्यों है?? फ़ौज में क्यों नहीं नेताओं के बेटे जाते? पूछा जनता ने तो नेता जी निरुत्तर क्यों है?? बूढ़े माँ-बाप की खातिर न जगह है दिल में. काट-तन-पेट खड़ा तुमने किया घर क्यों है?...

मुक्तिका:: कहीं निगाह... ---- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका::                                                                           कहीं निगाह... संजीव 'सलिल' * कदम तले जिन्हें दिल रौंद मुस्कुराना है. उन्ही के कदमों में ही जा गिरा जमाना है कहीं निगाह सनम और कहीं निशाना है. हज़ार झूठ सही, प्यार का फसाना है.. न बाप-माँ की है चिंता, न भाइयों का डर. करो सलाम ससुर को, वो मालखाना है.. पड़े जो काम तो तू बाप गधे को कह दे. न स्वार्थ हो तो गधा बाप को बताना है.. जुलुम की उनके कोई इन्तेहां नहीं लोगों मेरी रसोई के आगे रखा पाखाना है.. किसी का कौन कभी हो सका या होता है? अकेले आये 'सलिल' औ' अकेले जाना है.. चढ़ाये रहता है चश्मा जो आँख पे दिन भर. सचाई ये है कि बन्दा वो 'सल...

कविता: जीवन अँगना को महकाया -संजीव 'सलिल'

कविता: जीवन अँगना को महकाया संजीव 'सलिल' * * जीवन अँगना को महकाया श्वास-बेल पर खिली कली की स्नेह-सुरभि ने. कली हँसी तो फ़ैली खुशबू स्वर्ग हुआ घर. कली बने नन्हीं सी गुडिया. ममता, वात्सल्य की पुडिया. शुभ्र-नर्म गोला कपास का, किरण पुंज सोनल उजास का. उगे कली के हाथ-पैर फिर उठी, बैठ, गिर, खड़ी हुई वह. ठुमक-ठुमक छन-छननन-छनछन अँगना बजी पैंजन प्यारी दादी-नानी थीं बलिहारी. * कली उड़ी फुर्र... बनकर बुलबुल पा मयूर-पंख हँस-झूमी. कोमल पद, संकल्प ध्रुव सदृश नील-गगन को देख मचलती आभा नभ को नाप रही थी. नवल पंखुडियाँ ऊगीं खाकी मुद्रा-छवि थी अब की बाँकी. थाम हाथ में बड़ी रायफल कली निशाना साध रही थी. छननन घुँघरू, धाँय निशाना ता-ता-थैया, दायें-बायें लास-हास, संकल्प-शौर्य भी कली लिख रही नयी कहानी बहे नर्मदा में ज्यों पानी. बाधाओं की श्याम शिलाएँ संगमरमरी शिला सफलता कोशिश धुंआधार की धरा संकल्पों का सुदृढ़ किनारा. * कली न रुकती, कली न झुकती, कली न थकती, कली न चुकती. गुप-चुप, गुप-चुप बहती जाती. नित नव मंजिल गहती जाती. कली हँसी पुष्पायी आशा. सफल साधना, फलित ...

स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना: गीत भारत माँ को नमन करें.... संजीव 'सलिल'

स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना: गीत भारत माँ को नमन करें.... संजीव 'सलिल' * * आओ, हम सब एक साथ मिल भारत माँ को नमन करें. ध्वजा तिरंगी मिल फहराएँ इस धरती को चमन करें..... * नेह नर्मदा अवगाहन कर राष्ट्र-देव का आवाहन कर बलिदानी फागुन पावन कर अरमानी सावन भावन कर  राग-द्वेष को दूर हटायें एक-नेक बन, अमन करें. आओ, हम सब एक साथ मिल भारत माँ को नमन करें...... * अंतर में अब रहे न अंतर एक्य कथा लिख दे मन्वन्तर श्रम-ताबीज़, लगन का मन्तर भेद मिटाने मारें मंतर सद्भावों की करें साधना सारे जग को स्वजन करें. आओ, हम सब एक साथ मिल भारत माँ को नमन करें...... * काम करें निष्काम भाव से श्रृद्धा-निष्ठा, प्रेम-चाव से रुके न पग अवसर अभाव से बैर-द्वेष तज दें स्वभाव से 'जन-गण-मन' गा नभ गुंजा दें निर्मल पर्यावरण करें. आओ, हम सब एक साथ मिल भारत माँ को नमन करें...... * जल-रक्षण कर पुण्य कमायें पौध लगायें, वृक्ष बचायें नदियाँ-झरने गान सुनायें पंछी कलरव कर इठलायें भवन-सेतु-पथ सुदृढ़ बनाकर सबसे आगे वतन करें. आओ, हम सब एक साथ मिल भारत माँ को ...

मुक्तिका ......... बात करें संजीव 'सलिल'

मुक्तिका ......... बात करें संजीव 'सलिल' * * बात न मरने की अब होगी, जीने की हम बात करें. हम जी ही लेंगे जी भरकर, अरि मरने की बात करें. जो कहने की हो वह करने की भी परंपरा डालें. बात भले बेबात करें पर मौन न हों कुछ बात करें.. नहीं सियासत हमको करनी, हमें न कोई चिंता है. फर्क न कुछ, सुनिए मत सुनिए, केवल सच्ची बात करें.. मन से मन पहुँच सके जो, बस ऐसा ही गीत रचें. कहें मुक्तिका मुक्त हृदय से, कुछ करने की बात करें.. बात निकलती हैं बातों से, बात बात तक जाती है. बात-बात में बात बनायें, बात न करके बात करें.. मात-घात की बात न हो अब, जात-पांत की बात न हो. रात मौन की बीत गयी है, तात प्रात की बात करें.. पतियाते तो डर जाते हैं, बतियाते जी जाते हैं. 'सलिल' बात से बात निकालें, मत मतलब की बात करें.. *************** Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com

नव गीत: हम खुद को.... संजीव 'सलिल'

नव गीत: हम खुद को.... संजीव 'सलिल' * * हम खुद को खुद ही डंसते हैं... * जब औरों के दोष गिनाये. हमने अपने ऐब छिपाए. विहँस दिया औरों को धोखा- ठगे गए तो अश्रु बहाये. चलते चाल चतुर कह खुद को- बनते मूर्ख स्वयं फंसते हैं... * लिये सुमिरनी माला फेरें. मन से प्रभु को कभी न टेरें. जब-जब आपद-विपदा घेरें- होकर विकल ईश-पथ हेरें. मोह-वासना के दलदल में संयम रथ पहिये फंसते हैं.... * लगा अल्पना चौक रंगोली, फैलाई आशा की झोली. त्योहारों पर हँसी-ठिठोली- करे मनौती निष्ठां भोली. पाखंडों के शूल फूल की क्यारी में पाये ठंसते हैं..... * पुरवैया को पछुआ घेरे. दीप सूर्य पर आँख तरेरे. तड़ित करे जब-तब चकफेरे नभ पर छाये मेघ घनेरे. आशा-निष्ठां का सम्बल ले हम निर्भय पग रख हँसते हैं..... **************** Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com

कविता : संजीव 'सलिल'

कविता  :  संजीव 'सलिल' * * जिसने कविता को स्वीकारा, कविता ने उसको उपकारा. शब्द्ब्रम्ह को नमन करे जो, उसका है हरदम पौ बारा.. हो राकेश दिनेश सलिल वह, प्रतिभा उसकी परखी जाती-  होम करे पल-पल प्राणों का, तब जलती कविता की बाती.. भाव बिम्ब रस शिल्प और लय, पञ्च तत्व से जो समरस हो. उस कविता में, उसके कवि में, पावस शिशिर बसंत सरस हो.. कविता भाषा की आत्मा है, कविता है मानव की प्रेरक. राजमार्ग की हेरक भी है, पगडंडी की है उत्प्रेरक.. कविता सविता बन उजास दे, दे विश्राम तिमिर को लाकर. कविता कभी न स्वामी होती, स्वामी हों कविता के चाकर.. कविता चरखा, कविता चमडा, कविता है करताल-मंजीरा. लेकिन कभी न कविता चाहे, होना तिजोरियों का हीरा.. कविता पनघट, अमराई है, घर-आँगन, चौपाल, तलैया. कविता साली-भौजाई है, बेटा-बेटी, बाबुल-मैया.. कविता सरगम, ताल, नाद, लय, कविता स्वर, सुर वाद्य समर्पण. कविता अपने अहम्-वहम का, शरद-पग में विनत विसर्जन.. शब्द-साधना, सताराधना, शिवानुभूति 'सलिल' सुन्दर है. कह-सुन-गुन कवितामय होना, करना निज मन को मंदिर है.. ***************...

पित्तृ दिवस पर : स्मृति गीत / शोक गीत --संजीव 'सलिल'

पित्तृ  दिवस पर : स्मृति गीत / शोक गीत संजीव 'सलिल' * याद आ रही पिता तुम्हारी याद आ रही पिता तुम्हारी... * तुम सा कहाँ मनोबल पाऊँ? जीवन का सब विष पी पाऊँ. अमृत बाँट सकूँ स्वजनों को- विपदा को हँस सह मुस्काऊँ. विधि ने काहे बात बिगारी? याद आ रही पिता तुम्हारी... * रही शीश पर जब तव छाया. तनिक न विपदा से घबराया. आँधी-तूफां जब-जब आये- हँसकर मैंने गले लगाया. बिना तुम्हारे हुआ भिखारी. याद आ रही पिता तुम्हारी... * मन न चाहता खुशी मनाऊँ. कैसे जग को गीत सुनाऊँ? सपने में आकर मिल जाओ- कुछ तो ढाढस- संबल पाऊँ. भीगी अँखियाँ होकर खारी. याद आ रही पिता तुम्हारी... *  

काव्य रचना: मुस्कान --संजीव 'सलिल'

काव्य रचना: मुस्कान संजीव 'सलिल' जिस चेहरे पर हो मुस्कान, वह लगता हमको रस-खान.. अधर हँसें तो लगता है- हैं रस-लीन किशन भगवान.. आँखें हँसती तो दिखते - उनमें छिपे राम गुणवान.. उमा, रमा, शारदा लगें रस-निधि कोई नहीं अनजान.. 'सलिल' रस कलश है जीवन सुख देकर बन जा इंसान.. ***********************

रामदेव का राजनीतिक रंग

अब बाबा रामदेव अपने असली रंग में दिख रहे हैं. बात करते हैं तो बार बार उत्साह को बनाये रखने की सलाह देते हैं. जयपुर, दिल्ली और जोधपुर में तीन सभाओं के दौरान उन्होंने कमोबेश एक बात ही कही कि राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन को आगे बढ़ाना है और "चोर" "लुटेरे" "डाकुओं" से देश को मुक्त कराना है. यह विशेषण बाबा रामदेव किसके लिए इस्तेमाल कर रहे हैं यह बताने की जरूरत नहीं है. ये चोर लुटेरे और डाकू कोई और नहीं बल्कि इस देश के वही नेता हैं जिन्हें अपने योग शिविरों में बुलाकर रामदेव अपना कद बढ़ाते रहे हैं. मैंने कहा बाबा रामदेव अब अपने असली रंग में हैं. थोड़ा वक्त लगा लेकिन वे आखिरकार देश को सुधारने और देश का स्वाभिमान जगाने निकल ही पड़े. आस्था टीवी चैनल पर कनखल के आश्रम से जब उन्होंने पहली बार अपने योग शिविर का लाईव प्रसारण शुरू किया था संयोग ही है कि वह लाईव प्रसारण भी मैंने टीवी पर देखा था. कुल जमा दो तीन सौ लोग होते थे. कुछ दिनों तक बाबा ने यहीं से योग शिविर चलाया लेकिन अचानक ही जैसे योग क्रांति ने जन्म ले लिया. इसलिए बाबा ने बड़े शिविर आयोजित करने शुरू कर दिये. ...

जनमत: हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा है या राज भाषा?

जनमत: हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा है या राज भाषा? सोचिये और अपना मत बताइए: आप की सोच के अनुसार हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा है या राज भाषा? क्या आम मानते हैं कि हिन्दी भविष्य की विश्व भाषा है? क्या संस्कृत और हिन्दी के अलावा अन्य किसी भाषा में अक्षरों का उच्चारण ध्वनि विज्ञानं के नियमों के अनुसार किया जाता है? अक्षर के उच्चारण और लिपि में लेखन में साम्य किन भाषाओँ में है? अमेरिका के राष्ट्रपति अमेरिकियों को बार-बार हिन्दी सीखने के लिए क्यों प्रेरित कर रहे हैं? अन्य सौरमंडलों में संभावित सभ्यताओं से संपर्क हेतु विश्व की समस्त भाषाओँ को परखे जाने पर संस्कृत और हिन्दी सर्वश्रेष्ठ पाई गयीं हैं तो भारत में इनके प्रति उदासीनता क्यों? क्या भारत में अंग्रेजी के प्रति अंध-मोह का कारण उसका विदेशी शासन कर्ताओं से जुड़ा होना नहीं है? Acharya Sanjiv सलिल / http://divyanarmada.blogspot.com

दोहा गीत: धरती ने हरियाली ओढी --संजीव 'सलिल'

धरती ने हरियाली ओढी, मनहर किया सिंगार., दिल पर लोटा सांप हो गया सूरज तप्त अंगार... * नेह नर्मदा तीर हुलसकर बतला रहा पलाश. आया है ऋतुराज काटने शीत काल के पाश. गौरा बौराकर बौरा की करती है मनुहार. धरती ने हरियाली ओढी, मनहर किया सिंगार. * निज स्वार्थों के वशीभूत हो छले न मानव काश. रूठे नहीं बसंत, न फागुन छिपता फिरे हताश. ऊसर-बंजर धरा न हो, न दूषित मलय-बयार. धरती ने हरियाली ओढी, मनहर किया सिंगार.... * अपनों-सपनों का त्रिभुवन हम खुद ना सके तराश. प्रकृति का शोषण कर अपना खुद ही करते नाश. जन्म दिवस को बना रहे क्यों 'सलिल' मरण-त्यौहार? धरती ने हरियाली ओढी, मनहर किया सिंगार.... *************** दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

नवगीत: मगरमचछ सरपंच... -संजीव 'सलिल'

मगरमचछ सरपंच मछलियाँ घेरे में फंसे कबूतर आज बाज के फेरे में... सोनचिरैया विकल न कोयल कूक रही हिरनी नाहर देख न भागी, मूक रही जुड़े पाप ग्रह सभी कुण्डली मेरे में... गोली अमरीकी बोली अंगरेजी है ऊपर चढ़ क्यों तोडी स्वयं नसेनी है? सन्नाटा छाया जनतंत्री डेरे में... हँसिया फसलें अपने घर में भरता है घोड़ा-माली हरी घास ख़ुद चरता है शोले सुलगे हैं कपास के डेरे में... *****
गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत: सारा का सारा हिंदी है आचार्य संजीव 'सलिल' * जो कुछ भी इस देश में है, सारा का सारा हिंदी है. हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है.... मणिपुरी, कथकली, भरतनाट्यम, कुचपुडी, गरबा अपना है. लेजिम, भंगड़ा, राई, डांडिया हर नूपुर का सपना है. गंगा, यमुना, कावेरी, नर्मदा, चनाब, सोन, चम्बल, ब्रम्हपुत्र, झेलम, रावी अठखेली करती हैं प्रति पल. लहर-लहर जयगान गुंजाये, हिंद में है और हिंदी है. हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है.... मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजा सबमें प्रभु एक समान. प्यार लुटाओ जितना, उतना पाओ औरों से सम्मान. स्नेह-सलिल में नित्य नहाकर, निर्माणों के दीप जलाकर. बाधा, संकट, संघर्षों को गले लगाओ नित मुस्काकर. पवन, वन्हि, जल, थल, नभ पावन, कण-कण तीरथ, हिंदी है. हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है.... जै-जैवन्ती, भीमपलासी, मालकौंस, ठुमरी, गांधार. गजल, गीत, कविता, छंदों से छलक रहा है प्यार अपार. अरावली, सतपुडा, हिमालय, मैकल, विन्ध्य, उत्तुंग शिखर. ठहरे-ठहरे गाँव हमारे...

मुक्तिका: खुशबू --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका खुशबू संजीव 'सलिल' कहीं है प्यार की खुशबू, कहीं तकरार की खुशबू.. कभी इंकार की खुशबू, कभी इकरार की खुशबू.. सभी खुशबू के दीवाने हुए, पीछे रहूँ क्यों मैं? मुझे तो भा रही है यार के दीदार की खुशबू.. सभी कहते न लेकिन चाहता मैं ठीक हो जाऊँ. उन्हें अच्छी लगे है दिल के इस बीमार की खुशबू. तितलियाँ फूल पर झूमीं, भ्रमर यह देखकर बोला. कभी मुझको भी लेने दो दिले-गुलज़ार की खुशबू. 'सलिल' थम-रुक न झुक-चुक, हौसला रख हार को ले जीत. रहे हर गीत में मन-मीत के सिंगार की खुशबू.. ****************

नर्मदा नामावली आचार्य संजीव 'सलिल'

नर्मदा नामावली आचार्य संजीव 'सलिल' पुण्यतोया सदानीरा नर्मदा. शैलजा गिरिजा अनिंद्या वर्मदा. शैलपुत्री सोमतनया निर्मला. अमरकंटी शांकरी शुभ शर्मदा. आदिकन्या चिरकुमारी पावनी. जलधिगामिनी चित्रकूटा पद्मजा. विमलहृदया क्षमादात्री कौतुकी. कमलनयनी जगज्जननि हर्म्यदा. शाशिसुता रौद्रा विनोदिनी नीरजा. मक्रवाहिनी ह्लादिनी सौंदर्यदा. शारदा वरदा सुफलदा अन्नदा. नेत्रवर्धिनि पापहारिणी धर्मदा. सिन्धु सीता गौतमी सोमात्मजा. रूपदा सौदामिनी सुख-सौख्यदा. शिखरिणी नेत्रा तरंगिणी मेखला. नीलवासिनी दिव्यरूपा कर्मदा. बालुकावाहिनी दशार्णा रंजना. विपाशा मन्दाकिनी चित्रोंत्पला. रुद्रदेहा अनुसूया पय-अंबुजा. सप्तगंगा समीरा जय-विजयदा. अमृता कलकल निनादिनी निर्भरा. शाम्भवी सोमोद्भवा स्वेदोद्भवा. चन्दना शिव-आत्मजा सागर-प्रिया. वायुवाहिनी कामिनी आनंददा. मुरदला मुरला त्रिकूटा अंजना. नंदना नाम्माडिअस भव मुक्तिदा. शैलकन्या शैलजायी सुरूपा. विपथगा विदशा सुकन्या भूषिता. गतिमयी क्षिप्रा शिवा मेकलसुता. मतिमयी मन्मथजयी लावण्यदा. रतिमयी उन्मादिनी वैराग्यदा. यतिम...

शुभ कामनाएं सभी को... संजीव "सलिल"

शुभ कामनाएं सभी को... संजीव "सलिल" salil.sanjiv@gmail.com divyanarmada.blogspot.com शुभकामनायें सभी को, आगत नवोदित साल की. शुभ की करें सब साधना,चाहत समय खुशहाल की.. शुभ 'सत्य' होता स्मरण कर, आत्म अवलोकन करें. शुभ प्राप्य तब जब स्वेद-सीकर राष्ट्र को अर्पण करें.. शुभ 'शिव' बना, हमको गरल के पान की सामर्थ्य दे. शुभ सृजन कर, कंकर से शंकर, भारती को अर्ध्य दें.. शुभ वही 'सुन्दर' जो जनगण को मृदुल मुस्कान दे. शुभ वही स्वर, कंठ हर अवरुद्ध को जो ज्ञान दे.. शुभ तंत्र 'जन' का तभी जब हर आँख को अपना मिले. शुभ तंत्र 'गण' का तभी जब साकार हर सपना मिले.. शुभ तंत्र वह जिसमें, 'प्रजा' राजा बने, चाकर नहीं. शुभ तंत्र रच दे 'लोक' नव, मिलकर- मदद पाकर नहीं.. शुभ चेतना की वंदना, दायित्व को पहचान लें. शुभ जागृति की प्रार्थना, कर्त्तव्य को सम्मान दें.. शुभ अर्चना अधिकार की, होकर विनत दे प्यार लें. शुभ भावना बलिदान की, दुश्मन को फिर ललकार दें.. शुभ वर्ष नव आओ! मिली निर्माण की आशा नयी. शुभ काल की जयकार हो, पुष्पा सके भा...