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कृष्ण के वंशज ...गुर्ज़रों को आन्दोलन की आवश्यकता है क्या...डा श्याम गुप्त --

आखिर गुर्जर आन्दोलन का लक्ष्य क्या है ? -- 5% सरकारी नौकरियां --आखिर क्यों ? यदि कृष्ण चाहते तो कंस की नौकरी करके मज़े से रहते पर उन्होंने मटकी फोड़ने का मार्ग चुना ... . गोकुल - बृज धाम की अपनी स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का , अपनी स्वायत्तता का मार्ग , कर्म का मार्ग... । क्यों देश - दुनिया को दुग्ध प्रदान करने वाला समाज , एक स्वतंत्र अर्थ व्यवस्था वाला समाज अपने बच्चों को नाकारा , बाबू गीरी अभ्यस्त , आलसी , पराबलंबी बनाना चाहता है , नौकरी का चस्का लगाकर । वे क्यों नहीं उन्हें अपना स्वतंत्र व्यवसाय करने का परामर्श देते। विभिन्न बैंकों , समाजसेवी संस्थाओं , एन आर आई की सहायता से वे अपना स्वतंत्र दुग्ध , दुग्ध -खाद्य पदार्थों का स्वतंत्र व्यवसाय कर सकते हैं। स्व के साथ देश, समाज की भी सेवा...कृष्ण की भांति.... आरक्षण की वैशाखी वाले समाज आज कहाँ हैं , उनकी क्या दशा है सभी जानते हैं । उनके बच्चे स्कूल , संस्थान सभी जगह अन्य इतर अनारक्षित के शब्द वाणों -- अयोग्य ,अपात्र, सरकारी दामाद, पहुँच वाले,--आदि का दंश किस तरह ...

वो वीक प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गये

प्रभात शुंगलू एडिटर स्पेशल असाइनमेंट पिछले पांच साल लाल कृष्ण आडवाणी कहते रहे कि मनमोहन सिंह वीक प्राइम मिनिस्टर हैं। यूपीए की सत्ता का रिमोट कंट्रोल पांच साल 10 जनपथ यानी सोनिया गांधी के पास था। लेकिन आडवाणी जी वरुण के मामले पर चुप बैठे रहे। वरुण के जहरीले भाषण को एक बार भी कंडेम नहीं किया। एक बार भी पार्टी को नहीं कहा कि वरुण के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। शायद वरुण के भड़काऊ बयानों में वो अपने पुराने दिनों की मिरर इमेज देख रहे थे। इसलिये हिम्मत नहीं जुटा पाए कि वरुण से कहें अपनी गलती की माफी मांगे वर्ना टिकट वापस ले लिया जायेगा। ये कहते तो वीक माने जाते। आडवाणी ने अपने युवा साथी शिवराज से भी कुछ नहीं सीखा। जिस दिन वरुण की सीडी का खुलासा हुया उस दिन शिवराज ने डैमेज कंट्रोल के तहत मुस्लिम संगठनों से बातचीत की। उन्हें भरोसा दिलाया वरुण के जहरीले बयान से वो कतई इत्तेफाक नहीं रखते। शिवराज ने वीकनेस दरकिनार की और हिम्मत दिखाई। आडवाणी जी सर्वजन का प्रधानमंत्री बनने का दावा नहीं कर पाए। ये रही उनकी वीकनेस। जब गुजरात दंगे हुए तब भी आडवाणी जी की वीकनेस नजर आई। मोदी के खिलाफ चूं नहीं कर पाए। अ...

दोहे : आचार्य संजीव 'सलिल'

आरक्षण ने कर दिया, नष्ट स्नेह-सद्भाव। राजनीति विष-वल्लरी, फैलाती अलगाव।। प्रतिभाएं कुंठित हुईं, बिन अवसर बेचैन। सूरदास ज्यों फोड़ते, मृगनयनी के नैन॥ आरक्षण धृतराष्ट्र को, पांडव को वनवास। जब मिलता तब देश का , होता सत्यानास॥ जातिवाद के नाग का, दंश बन गया मौत। सती योग्यता को हुई, जाट तवायफ सौत॥ हीरा पड़ा बजार में, कांच हुआ अनमोल। जन-सेवा वृत्त-तप गया, सत्ता-सुख-लाख दोल। ***********