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गीत आचार्य संजीव 'सलिल'

गीत छोड़ अहिंसा शस्त्र उठाओ काले बादल ने रोका है फ़िर से मार्ग मयंक का. छोड़ अहिंसा शस्त्र उठायें, सिर काटें आतंक का... राजनीति के गलियारों से आशा तनिक न शेष है. लोकनीति की ताकत सचमुच अपराजेय अशेष है. शासक और विपक्षी दल केवल सत्ता के लोभी हैं. रामराज के हैं कलंक ये, सिया विरोधी धोबी हैं. हम जनगण वानर भालू बन साथ अगर डट जाएँगे- आतंकी असुरों का भू से नाम निशान मिटायेंगे. मिल जवाब दे पाएंगे हम हर विषधर के डंक का. छोड़ अहिंसा शस्त्र उठायें, सिर काटें आतंक का... अब न करें अनुरोध कुचल दें आतंकी बटमारों को. राज खोलते पुलिस बलों का पत्रकार गद्दारों को. शासन और प्रशासन दोनों जनगण सम्मुख दोषी हैं. सीमा पार करें, न संदेसा पहुंचाएं संतोषी हैं. आंसू को शोलों में बदलें बदला लें हर चोट का. नहीं सुरक्षा का मसला हो बंधक लालच नोट का आतंकी शिविरों के रहते दाग न मिटे कलंक का. छोड़ अहिंसा शस्त्र उठायें, सिर काटें आतंक का... अनुमति दे दो सेनाओं को, एक न बैरी छोडेंगे. काश्मीर को मिला देश में कमर पाक की तोडेंगे. दानव है दाऊद न वह या संगी-साथी बच पा...

मां का दर्द

अमित कुमार दुबे वरुण गांधी आज एक ऐसा चेहरा बन गया है। जो इस चुनावी-संग्राम में पक्ष-विपक्ष के लिए सबसे पहला मुद्दा है। वरुण के जह्न में भी कभी नहीं आया होगा कि उनका बयान उन्हें हीरो और विलेन दोनों रूप में प्रस्तुत करेगा। एक छोटी से लेकर बड़ी राजनीतिक पार्टियां वरुण मुद्दे को भुनाने में लगी है। दरअसल पहले तो उत्तर प्रदेश सरकार ने चुप्पी साध रखी। लेकिन जब चुप्पी तोड़ी तो एक नया रूप देखने को मिला। दरअसल राज्य सरकार के समक्ष एक समस्या आ गई कि इस मुद्दे पर अगर कड़े कदम नहीं उठाए गए तो जनाधार में बट्टा लग सकता है और आनन-फानन में वरुण रासुका लगा दिया गया। वहीं समाजवादी पार्टी और कांग्रेस एक ही राग जप रही है कि इसके पीछे बसपा और बीजेपी की मिलीभगत है। खुद बीजेपी वरुण को लेकर पशोपेश में पड़ी है। उसे ये भी पता है कि वरुण मुद्दे पर पीलीभीत के हिन्दुओं की ही नहीं पूरे सूबे में अपना खोया जनाधार को फिर से पाया जा सकता है। लेकिन राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में हिचकिचा रही है। क्योंकि कहीं सहयोगी रूठ न जाएं। मालूम हो कि वरुण मामले पर जदयू नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी नाराजगी जाहिर कर ...

आज की राजनीति ... सेवा न होकर गन्दा व्यवसाय हो गया

आज की राजनीति ... घिन आती है । कोई विचारधारा नही , कोई मकसद नही .... सेवा न होकर गन्दा व्यवसाय हो गया है । साफ़ सुथरा व्यवसाय होता तो भी ठीक था । सेवा की बात तो करना बेमानी है । यह गन्दा व्यवसाय है जिसमे लेन देन का कोई नियम नही । केवल लूट खसोट है ... बेईमानी है । यही कारण है की घिन आती है । लोग कहते है की युवाओं को आगे आना चाहिए ... बिल्कुल आगे आना चाहिए । केवल युवा ही क्यों , हर अच्छे आदमी को आना चाहिए । अफ्शोश वह कोई सेलेक्सन का प्रोशेष तो है नही । किसी भी बाहरी आदमी को अछूत समझा जाता है । उन्हें हटाने के लिए किसी हद तक हमारे आदरणीय नेता जा सकते है । न तो आदर्श है, न सोच है, न उसूल हैं और न ही कोई विचारधारा है। जो अजेंडा चुनाव से पहले जितने जोर-शोर से प्रचारित किया जाता है, चुनाव के बाद उसका कहीं नामोनिशान नहीं मिलता। चुनाव से पहले तमाम वादे किए जाते हैं। लोगों की समस्याओं को खत्म करने के इरादे जाहिर किए जाते ह...