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मुक्तक : आचर्य सन्जीव 'सलिल'

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ मुक्तक : आचार्य सन्जीव 'सलिल' जो दूर रहते हैं वही तो पास होते हैं. जो हँस रहे, सचमुच वही उदास होते हैं. सब कुछ मिला 'सलिल' जिन्हें अतृप्त हैं वहीं- जो प्यास को लें जीत वे मधुमास होते हैं. ********* पग चल रहे जो वे सफल प्रयास होते हैं न थके रुक-झुककर वही हुलास होते हैं. चीरते जो सघन तिमिर को सतत 'सलिल'- वे दीप ही आशाओं की उजास होते है. ********* जो डिगें न तिल भर वही विश्वास होते हैं. जो साथ न छोडें वही तो खास होते हैं. जो जानते सीमा, 'सलिल' कह रहा है सच देव! वे साधना-साफल्य का इतिहास होते हैं **********

मुक्तक -- आचार्य संजीव 'सलिल'

पुस्तकें मिलने-मिलाने का बहाना हो गयीं. आए कासिद या न आए वो फसाना हो गयीं. दूरदर्शन या कि अंतरजाल में दूरी 'सलिल'- जो चली पुस्तक लिए वो ख़ुद निशाना हो गयी. ******************************************* हुस्न-ओ-इश्क की बातें न करो ऐ जानम!. ताज में अब न मोहब्बत के फूल खिलते हैं. बोलते बम रहे शिव जी के भक्त आज तलक- ताज में आजकल शव और बम ही मिलते हैं. ******************************************* बहाते हैं जो लहू रोज़ बेकसूरों का. लहू उनका भी रोज नालियों में बहता है. जो टूटता है उसे फ़िर बना लेता है 'सलिल'- जालिमों का कभी नामो-निशान न रहता है. *******************************************