♦ विनीत कुमार विनीत ने यह आलेख द लास्ट सैल्यूट के उस विज्ञापन के प्रतिकार में लिखा है, जिसमें लीड स्पॉन्सर के रूप में बाटा के लोगो को प्रमुखता से जगह मिली है। पाठकों को पर्याप्त सहूलियत हो, इसलिए हम उस विज्ञापन की तस्वीर भी छाप रहे हैं। इस पूरे आलेख में थिएटर से एक बड़ी वैचारिक क्रांति की मांग के तहत कहा गया है कि चूंकि नाटक में जूता एक विचारधारा का प्रतीक है, बाटा से स्पॉन्सरशिप नहीं लेनी चाहिए। लेनी भी चाहिए, तो लीड स्पॉन्सरशिप तो कतई नहीं लेनी चाहिए। अपने पिछले कई आलेखों में बाजार के दौर में पिछड़ रही हिंदी को अपडेट करने की बात करने वाले विनीत का यह आलेख इस बात की मांग करता है कि नाटक को मुफ्त में ही देखने की चीज होना चाहिए और यह भी कि उसे बाजारू हरकतों से बाज आना चाहिए। खैर, असहमति के साथ ही सही, हम उनके इस आलेख को अतिशय सम्मान के साथ प्रकाशित कर रहे हैं : मॉडरेटर नाटक का विज्ञापन बड़ी साइज में देखने के लिए इमेज पर चटका लगाएं। बा टा के जूते का इससे मजबूत और भावनात्मक स्तर पर विज्ञापन शायद ही पहले कभी हुआ हो। देश के गिने-चुने सरोकारी और समाज के हक के लिए लड़नेवालो...