'सलिल' को दे दर्द अपने, चैन से सो जाइए. नर्मदा है नेह की, फसलें यहाँ बो जाइए. चंद्रमा में चांदनी भी और धब्बे-दाग भी. चन्दनी अनुभूतियों से पीर सब धो जाइए. होश में जब तक रहे, मैं-तुम न हम हो पाए थे. भुला दुनिया मस्त हो, मस्ती में खुद खो जाइए. खुदा बनने था चला, इंसा न बन पाया 'सलिल'. खुदाया अब आप ही, इंसान बन दिखलाइए. एक उँगली उठाता है जब भी गैरों पर; सलिल' तीन उँगली चीखती हैं, खुद सुधर कर आइए.