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मुक्तक : आचार्य संजीव 'सलिल'

सर को कलम कर लें भले, सरकश रहें हम. सजदा वहीं करेंगे, जहाँ आँख भी हो नम. उलझे रहो तुम घुंघरुओं, में सुनते रहो छम. हमको है ये मालूम,'सलिल'कम नहीं हैं गम.