बाद मुद्दतके मिले ,मिले तो ज़नाब । गुंचाए -दिल खिले ,खिले तो ज़नाब। तमन्नाएं , आरजू, चाहतें पूरी हुईं , हसरतें -दिले निकलीं,निकलीं तो ज़नाब। खुदा की मेहर्वानियों की ऐसीबरसात हुई, सिलसिले मिलने के हुए,हुए तो ज़नाब। इक नए बहाने से ,तुमने बुलाया हमें , बाद मुद्दत के खुले,खुले तो ज़नाब। कहते थे भूल जाना ,भूल जायेंगे हम भी, भूले भी खूब, खूब याद आए भी ज़नाब। अब न वो जोशो-जुनूँ,न वो ख्वाहिशें रहीं, आना न था फ़िर भी, आए तो ज़नाब । आशिकी की ये डोर भी ,कैसी है 'श्याम, न याद कर पायें उन्हें,न भूल पायें ज़नाब॥