नवगीत: करो बुवाई... खेत गोड़कर करो बुवाई... * ऊसर-बंजर जमीन कड़ी है. मँहगाई जी-जाल बड़ी है. सच मुश्किल की आई घड़ी है. नहीं पीर की कोई जडी है. अब कोशिश की हो पहुनाई. खेत गोड़कर करो बुवाई... * उगा खरपतवार कंटीला. महका महुआ मदिर नशीला. हुआ भोथरा कोशिश-कीला. श्रम से कर धरती को गीला. मिलकर गले हँसो सब भाई. खेत गोड़कर करो बुवाई... * मत अपनी धरती को भूलो. जड़ें जमीन हों तो नभ छूलो. स्नेह-'सलिल' ले-देकर फूलो. पेंगें भर-भर झूला झूलो. घर-घर चैती पड़े सुनाई. खेत गोड़कर करो बुवाई... * Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com