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नवगीत: करो बुवाई... --संजीव 'सलिल'

नवगीत: करो बुवाई... खेत गोड़कर करो बुवाई... * ऊसर-बंजर जमीन कड़ी है. मँहगाई जी-जाल बड़ी है. सच मुश्किल की आई घड़ी है. नहीं पीर की कोई जडी है. अब कोशिश की हो पहुनाई. खेत गोड़कर करो बुवाई... * उगा खरपतवार कंटीला. महका महुआ मदिर नशीला. हुआ भोथरा कोशिश-कीला. श्रम से कर धरती को गीला. मिलकर गले हँसो सब भाई. खेत गोड़कर करो बुवाई... * मत अपनी धरती को भूलो. जड़ें जमीन हों तो नभ छूलो. स्नेह-'सलिल' ले-देकर फूलो. पेंगें भर-भर झूला झूलो. घर-घर चैती पड़े सुनाई. खेत गोड़कर करो बुवाई... * Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com

नवगीत: आओ! तम से लड़ें... --संजीव 'सलिल'

नवगीत: चलो! कुछ गायें... संजीव 'सलिल' क्यों है मौन? चलो कुछ गायें... * माना अँधियारा गहरा है. माना पग-पग पर पहरा है. माना पसर चुका सहरा है. माना जल ठहरा-ठहरा है. माना चेहरे पर चेहरा है. माना शासन भी बहरा है. दोषी कौन?... न शीश झुकायें. क्यों है मौन? चलो कुछ गायें... * सच कौआ गा रहा फाग है. सच अमृत पी रहा नाग है. सच हिमकर में लगी आग है. सच कोयल-घर पला काग है. सच चादर में लगा दाग है. सच काँटों से भरा बाग़ है. निष्क्रिय क्यों? परिवर्तन लायें. क्यों है मौन? चलो कुछ गायें... * Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com

नवगीत : घाव कितने?...... --संजीव 'सलिल'

गीत संजीव 'सलिल' * वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... * हम समझ ही नहीं पाए कौन क्या है? और तुमने यह न समझा मौन क्या है? साथ रहकर भी रहे क्यों दूर हरदम? कौन जाने हैं अजाने भाव कितने? वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... * चाहकर भी तुम न हमको चाह पाए. दाहकर भी हम न तुमको दाह पाए. बाँह में थी बाँह लेकिन राह भूले- छिपे तन-मन में रहे अलगाव कितने? वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... * अ-सुर-बेसुर से नहीं, किंचित शिकायत. स-सुर सुर की भुलाई है क्यों रवायत? नफासत से जहालत क्यों जीतती है? बगावत क्यों सह रही अभाव इतने? वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... * खड़े हैं विषधर, चुनें तो क्यों चुनें हम? नींद गायब तो सपन कैसे बुनें हम? बेबसी में शीश निज अपना धुनें हम- भाव नभ पर, धरा पर बेभाव कितने? वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... * साँझ सूरज-चंद्रमा सँग खेलती है. उषा रुसवाई, न कुछ कह झेलती है. हजारों तारे निशा के दिवाने है- 'सलिल' निर्मल पर पड़े प्रभाव कितने? वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... *************** Acharya...

नव गीत: मकान मत कहो... --संजीव 'सलिल'

नव गीत संजीव 'सलिल' घर को 'सलिल' मकान मत कहो... * कंकर में शंकर बसता है देख सको तो देखो. कण-कण में ब्रम्हांड समाया सोच-समझ कर लेखो. जो अजान है उसको तुम बेजान मत कहो. घर को 'सलिल' मकान मत कहो... * * भवन, भावना से सम्प्राणित होते जानो. हर कमरे- कोने को देख-भाल पहचानो. जो आश्रय देता है देव-स्थान नत रहो. घर को 'सलिल' मकान मत कहो... * घर के प्रति श्रद्धानत हो तब खेलो-डोलो. घर के कानों में स्वर प्रीति-प्यार के घोलो. घर को गर्व कहो लेकिन अभिमान मत कहो. घर को 'सलिल' मकान मत कहो... * स्वार्थों का टकराव देखकर घर रोता है. संतति का भटकाव देख धीरज खोता है. नवता का आगमन, पुरा-प्रस्थान मत कहो. घर को 'सलिल' मकान मत कहो... * घर भी श्वासें लेता आसों को जीता है. तुम हारे तो घर दुःख के आँसू पीता है. जयी देख घर हँसता, मैं अनजान मत कहो. घर को 'सलिल' मकान मत कहो... *

नवगीत: सूना-सूना घर का द्वार, --संजीव 'सलिल'

नवगीत: संजीव 'सलिल' सूना-सूना घर का द्वार, मना रहे कैसा त्यौहार?... * भौजाई के बोल नहीं, बजते ढोलक- ढोल नहीं. नहीं अल्पना- रांगोली. खाली रिश्तों की झोली. पूछ रहे: हाऊ यू आर? मना रहे कैसा त्यौहार?... * माटी का दीपक गुमसुम. चौक न डाल रहे हम-तुम. सज्जा हेतु विदेशी माल. कुटिया है बेबस-बेहाल. श्रमजीवी रोता बेज़ार. मना रहे कैसा त्यौहार?... * हल्लो!, हाय!! मोबाइल ने, दिया न हाथ- गले मिलने. नातों को जीता छल ने . लगी चाँदनी चुप ढलने. 'सलिल' न प्रवाहित नेह-बयार.मना रहे कैसा त्यौहार?... ****************

स्मृति गीत: सृजन विरासत --संजीव 'सलिल'

स्मृति गीत: संजीव 'सलिल' सृजन विरासत तुमसे पाई... * अलस सवेरे उठते ही तुम, बिन आलस्य काम में जुटतीं. सिगडी, सनसी, चिमटा, चमचा चौके में वाद्यों सी बजतीं. देर हुई तो हमें जगाने टेर-टेर आवाज़ लगाई. सृजन विरासत तुमसे पाई... * जेल निरीक्षण कर आते थे, नित सूरज उगने के पहले. तव पाबंदी, श्रम, कर्मठता से अपराधी रहते दहले. निज निर्मित व्यक्तित्व, सफलता पाकर तुमने सहज पचाई. सृजन विरासत तुमसे पाई... * माँ!-पापा! संकट के संबल गए छोड़कर हमें अकेला. विधि-विधान ने हाय! रख दिया है झिंझोड़कर विकट झमेला. तुम बिन हर त्यौहार अधूरा, खुशी पराई. सृजन विरासत तुमसे पाई... * यह सूनापन भी हमको जीना ही होगा गए मुसाफिर. अमिय-गरल समभावी हो पीना ही होगा कल की खातिर. अब न शीश पर छाँव, धूप-बरखा मंडराई. सृजन विरासत तुमसे पाई... * वे क्षर थे, पर अक्षर मूल्यों को जीते थे. हमने देखा. कभी न पाया ह्रदय-हाथ पल भर रीते थे युग ने लेखा. सुधियों का संबल दे प्रति पल राह दिखाई.. सृजन विरासत तुमसे पाई... *