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सितंबर ४, बाल कविता, तुहिना-दादी, मुक्तिका, सॉनेट, नर्मदा, दोहा,

सलिल सृजन सितंबर ४ विश्व ताइक्वांडो दिवस * सलिल दोहावली शील न रोने में तनिक, शील धरे मन धैर्य। शुभ के प्रति आश्वस्त हो, करें अशुभ से वैर्य।। • गत की कम चर्चा करें, आगत की हो फिक्र। जो मन में हरदम रहे, वह न चाहता जिक्र।। • मैं तुम हम होकर करें, चुप हो उसकी याद। जिसकी सुधियों को रखा, निशि-वासर आबाद।। • बीता समय न लौटता, यही सृष्टि का सत्य। प्रभु दर्शन देते नहीं, भक्त सुमिरते नित्य।। • नए दिवस का अवतरण, अर्ध रात्रि के बाद। उषा भोर होती प्रगट, लेकर शुभ संवाद।। • सरला मति होती भ्रमित, सच लगता संसार। कहते हैं मतिमान सब, है संसार असार।। • सुख का नित सुमिरन करें, सके न दुख तब व्याप। दुख की माला फेरकर, सुख खोते हम आप।। • सुख के पल जितने मिले, वे प्रभु कृपा प्रसाद। कृष्ण कांत संतोष दें, बिसरे कभी न याद।। • सदानंद थाती मिली, रूप पर्व-त्यौहार। नव पीढ़ी को साथ ले, मना लुटाएँ प्यार।। • श्वास श्वास सिंगार कर, आस आस मनुहार हास बना पाथेय लें, उन्नत रखें लिलार।। • बसा आत्म परमात्म जो, वह सर्वथा सुशील। लीन आप में आप है, जला याद कंदील।। • अश्रु पात कर मत करें, ईश्वर का अपमान। होनी को स्वीकार कर, रखें दैव ...

हास्य मुक्तिका: ...छोड़ दें?? -- संजीव 'सलिल'

हास्य मुक्तिका: ...छोड़ दें?? संजीव 'सलिल' * वायदों का झुनझुना हम क्यों बजाना छोड़ दें? दिखा सपने आम जन को क्यों लुभाना छोड़ दें?? गलतियों पर गलतियाँ कर-कर छिपाना छोड़ दें? दूसरों के गीत अपने कह छपाना छोड़ दें?? उठीं खुद पर तीन उँगली उठें परवा है नहीं एक उँगली आप पर क्यों हम उठाना छोड़ दें?? नहीं भ्रष्टाचार है, यह महज शिष्टाचार है. कह रहे अन्ना कहें, क्यों घूस खाना छोड़ दें?? पूजते हैं मंदिरों में, मिले राहों पर अगर. तो कहो क्यों छेड़ना-सीटी बजाना छोड़ दें?? गर पसीना बहाना है तो बहायें आम जन. ख़ास हैं हम, कहें क्यों करना बहाना छोड़ दें??   राम मुँह में, छुरी रखना बगल में विरसा 'सलिल' सिया को बेबात जंगल में पठाना छोड़ दें?? बुढाया है तन तो क्या? दिल है जवां  अपना 'सलिल' पड़ोसन को देख कैसे मुस्कुराना छोड़ दें? हैं 'सलिल' नादान क्यों दाना कहाना छोड़ दें?  रुक्मिणी पा गोपियों को क्यों भुलाना छोड़ दें?? Acharya Sanjiv verma 'Salil' http://divyanarmada.blogspot. com http://hindihindi.in

गीतिका: नर्मदा -आचार्य सन्जीव' सलिल'

सारांश यहाँ गीतिका आचार्य संजीव 'सलिल' साधना हो सफल नर्मदा- नर्मदा. वंदना हो विमल नर्मदा-नर्मदा. संकटों से न हारें, लडें,जीत लें. प्रार्थना हो प्रबल नर्मदा-नर्मदा. नाद अनहद गुंजाती चपल हर लहर. नृत्यरत हर भंवर नर्मदा-नर्मदा. धीर धर पीर हर लें गले से लगा. रख मनोबल अटल नर्मदा-नर्मदा. मोहिनी दीप्ति, आभा मनोरम नवल. नाद निर्मल नवल नर्मदा-नर्मदा. सिर कटाते समर में झुकाते नहीं. शौर्य-अर्णव अटल नर्मदा-नर्मदा. सतपुडा विन्ध्य मेकल सनातन शिखर सोन जुहिला सजल नर्मदा-नर्मदा. आस्था हो शिला, मित्रता हो 'सलिल'. प्रीत-बंधन तरल नर्मदा-नर्मदा. * * * * * आगे पढ़ें के आगे यहाँ
सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ गीतिका आचार्य संजीव 'सलिल' आते देखा खुदी को जब खुदा ही जाता रहा. गयी दौलत पास से क्या, दोस्त ही जाता रहा. दर्दे-दिल का ज़िक्र क्यों हो?, बात हो बेबात क्यों? जब ये सोचा बात का सब मजा ही जाता रहा. ठोकरें हैं राह का सच, पूछ लो पैरों से तुम. मिली सफरी तो सफर का स्वाद ही जाता रहा. चाँद को जब तक न देखा चाँदनी की चाह की. शमा से मिल शलभ का अरमान ही जाता रहा 'सलिल' ने मझधार में कश्ती को तैराया सदा. किनारों पर डूबकर सम्मान ही जाता रहा.. ***********************************

गीतिका - आचार्य संजीव 'सलिल'

'सलिल' को दे दर्द अपने, चैन से सो जाइए. नर्मदा है नेह की, फसलें यहाँ बो जाइए. चंद्रमा में चांदनी भी और धब्बे-दाग भी. चन्दनी अनुभूतियों से पीर सब धो जाइए. होश में जब तक रहे, मैं-तुम न हम हो पाए थे. भुला दुनिया मस्त हो, मस्ती में खुद खो जाइए. खुदा बनने था चला, इंसा न बन पाया 'सलिल'. खुदाया अब आप ही, इंसान बन दिखलाइए. एक उँगली उठाता है जब भी गैरों पर; सलिल' तीन उँगली चीखती हैं, खुद सुधर कर आइए.
तेवरी आचार्य संजीव 'सलिल' खोटे सिक्के हैं प्रचलन में. खरे न बाकी रहे चलन में. मन से मन का मिलन उपेक्षित. तन को तन की चाह लगन में. अनुबंधों के प्रतिबंधों से- संबंधों का सूर्य गहन में. होगा कभी, न अब बाकी है. रिश्ता कथनी औ' करनी में. नहीं कर्म की चिंता किंचित- फल की चाहत छिपी जतन में. मन का मीत बदलता पाया. जब भी देखा मन दरपन में. राम कैद ख़ुद शूर्पणखा की, भरमाती मादक चितवन में. स्नेह-'सलिल' की निर्मलता को- मिटा रहे हम अपनेपन में. * * * * * समन्वयम, २०४ विजय अपार्टमेन्ट, नेपियर टाऊन, जबलपुर ४८२००१ vaartaa : ०७६१-२४१११३१, चलभाष: 0९४२५१ ८३२४४ई मेल: सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम , ब्लॉग: संजिवसलिल.ब्लागस्पा ट.com