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बैकुण्ठ हो गया दादा जी को

बैकुण्ठ हो गया दादा जी को शम्भू नाथ मरने के बाद रोना चिल्लाना, क्रिया कर्म करना ये सब तो समझ में आता है, लेकिन ये बात समझ नहीं आयी कि हमारे दादा जी को बैकुण्ठ हो गया। जब दादा जी मर गये तो हमारे लोगों - परिजनों उनकी अर्थी को गंगा में विसर्जित करके क्रिया कर्म करने की योजना बनायी क्योंकि अधिक से अधिक पुराने किस्म के रितिरिवाज पूर्वी उत्तर प्रदेश मे पाये जाते हैं। यहाँ के लोग अधिक अंधविश्वासी ही होते हैं और अपने बुजुर्गों के बताये मार्ग पर चलते हैं। जब दादा जी की तेरहवीं थी तो नाते रिश्तेदारों का जमवाड़ा हो गया और जब सारे लोग खाना खा लिए तो औरतों ने चावल तौल करके एक बर्तन मे रखा और थोड़ी सी राख भी एक पीढ़ा पर बिछा दिया। उसके बाद लोग सोने को अपने अपने बिस्तर पर चले गये। जब रात बीत गयी तो दूसरे दिन सारी औरतों ने इकट्ठा हो करके सबसे पहले चावल तौला तो चावल थोड़ा ज्यादा, तो सब लोग कहने लगे की अब बरक्कत होगी, और अगर चावल कम होता तो कहते कि अब घाटा होगा। लेकिन चावल पहले की अपेक्षा ज्यादा था। उसके बाद राख का नम्बर आया तो राख को देख सबसे पहले औरतें ही बोली की दादा जी को बैकुण्ठ हो गया। बैकुण्ठ...