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रतन टाटा की दलाली और दादागीरी

अ लोक तोमर  हिन्दी पत्रकारिता में कालाहांडी के भूख की रिपोर्टिंग से चर्चा में आये आलोक तोमर आरोपों से घिरे रहनेवाले पत्रकार हैं. फिर भी सक्रियता में कोई कमी नहीं. लेखन के अलावा टीवी पत्रकारिता में सशक्त हस्ताक्षर के रूप में स्थापित. डेटनालाइन इंडिया और शब्दार्थ के संपादक 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में रतन टाटा ने नीरा राडिया के जरिए दयानिधि मारन की बजाय ए राजा को संचार मंत्री बनवाने का उपाय किया था. नीरा राडिया और रतन टाटा के बीच 2009 की बातचीत के जो और टेप निकल कर आए हैं उनका एक हिस्सा हम आपके सामने ला रहे हैं. इसमें साफ होता है कि कैसे रतन टाटा किसी भी कीमत पर दयानिधि मारन को संचार मंत्री बनने से रोक रहे थे. रतन टाटा- यह दयानिधि बहुत गड़बड़ कर रहा है। ए राजा को तो मैनेज किया जा सकता हैं। नीरा रा़डिया-  पता है और दयानिधि का फोन मेरे पास भी आया था। वो गुलाम नबी और अहमद पटेल से लगातार मिल रहा है। करुणानिधि से भी मनमोहन सिंह को फोन करवाया है। रतन टाटा-  इसका क्या करना है? मुझे तो यह आदमी खतरनाक लगता है और ये हमे दूसरों के बराबर खड़ा नहीं होने देगा। राजा ने बीएसएनएल वाल...

अभिज्ञात के रूप में कहानी का फिर एक तारा चमका है- संजीव

कोलकाताः  अभिज्ञात के रूप में कहानी का फिर एक तारा चमका है। एक जीवंत कथाकार की पुस्तक 'तीसरी बीवी' के लोकार्पण में मैं खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। वे उम्र में छोटे हैं, लेकिन उनके अनुभव की एक बड़ी दुर्जेय दुनिया है जो उनके डेग और डग को विरल और विशिष्ट बनाती है। यह कहना है प्रख्यात कथाकार और हंस के कार्यकारी संपादक संजीव का। भारतीय भाषा परिषद सभागार में 6 अप्रैल 2010 मंगलवार की शाम अभिज्ञात के कहानी संग्रह 'तीसरी बीवी' का लोकार्पण करते हुए उन्होंने यह बात कही।   संजीव ने कहा कि मैंने उनकी दो कहानियां हंस में छापी हैं। उनकी कहानियों के जो पारिवारिक दायरे हैं उनमें द्वंद्व के नये क्षेत्र, आस्था के नये बिन्दु हैं। उन्होंने समकालीन कथासंसार पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वे धन्य हैं जो प्रयोग के लिए प्रयोग और कला के कला का सहारा लेते हैं। पुनरुत्थानवाद फिर आ गया है जिसके परचम लहराये जा रहे हैं। नये कथाकारों की फौज़ आयी है। भाषा के एक से एक सुन्दर प्रयोग हो रहे हैं। अगर अपनी आत्ममुग्धता को सम्भाल लें तो बहुत है। अभिज्ञात की राह उनसे अलग है। मेरे पास हंस में प्रकाशनार्थ रोज...

हावड़ा ब्रिज-अभिज्ञात की लम्बी कविता

बंगाल में आये दिन बंद के दौरान किसी डायनासोर के अस्थिपंजर की तरह हावड़ा और कोलकाता के बीचोबीच हुगली नदी पर पड़ा रहता है हावड़ा ब्रिज जैसे सदियों पहले उसके अस्थिपंजर प्रवाहित किये गये हों हुगली में और वह अटक गया हो दोनों के बीच लेकिन यह क्या अचानक पता चला डायनासोर के पैर गायब थे जो शायद आये दिन बंद से ऊब चले गये हैं कहीं और किसी शहर में तफरीह करने या फिर अंतरिक्ष में होंगे कहीं जैसे बंद के कारण चला जाता है बहुत कुछ बहुत कुछ दबे पांव फिलहाल तो डायनासोर का अस्थिपंजर एक उपमा थी जो मेरे दुख से उपजी थी जिसका व्याकरण बंद के कारण हावड़ा ब्रिज की कराह की भाषा से बना था जिसे मैंने सुना उसी तरह जैसे पूरी आंतरिकता से सुनती हैं हुगली की लहरें क्या आपने गौर किया है बंद के दिन अधिक बेचैन हो जाती हैं हुगली की लहरें वे शामिल हो जाती हैं ब्रिज के दुख में बंद के दौरान हावड़ा ब्रिज से गुज़रना जैसे किसी बियाबान से गुज़रना है महानगर के बीचोबीच बंद के दौरान तेज़-तेज़ चलने लगती हैं हवाएं जैसे चल रही हों किसी की सांसें तेज़ तेज़ और उसके बचे रहने को लेकर उपजे मन में रह-रह कर सशंय बंद के दौरान बढ़ जाती है ब्रिज ...