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हर पल टूटता-बिखरता पाकिस्तान

किसी भी देश के इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जो निर्णायक होते हैं और उसकी किस्मत तय करते हैं। पाकिस्तान इस वक्त ऐसे ही दौर से गुजर रहा है। संकट के साये वैसे तो काफी दिनों से बढ़ रहे थे। साये जब छोटे होते हैं, तो मुंह चिढ़ाते हैं, लेकिन जब अपने कद से बड़े हो जाते हैं, तो डराने लगते हैं। पाकिस्तान में साये अब डराने लगे हैं। जेहादी आतंकवाद का खतरा अब पाकिस्तान के वजूद को खत्म करने पर आमादा है। जेहाद पाकिस्तान के लिए नया नहीं है। जनरल जिया उल हक के पहले से ही इसकी जमीन पाकिस्तान में पुख्ता थी। लेकिन जिया के सरकारी संरक्षण ने इसको नई जिंदगी दी। जिया के जमाने में इस्लामीकरण सरकार की राष्ट्रीय नीति हो गई। यह मामूली इस्लामीकरण नहीं था। जिया इसको समझते थे या नहीं, लेकिन सऊदी अरब से जो पैसा आया और उससे जिस तरह के मदरसे बने और उनमें जो पढ़ाई हुई, वह बेहद खतरनाक थी। सिर्फ पाकिस्तान के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए। जिया उल हक की नीतियों की वजह से ही पाकिस्तान में कट्टरपंथियों ने मदरसों के जरिये अपनी जबर्दस्त पैठ बनाई। चार्ल्स एलेन अपनी किताब गॉड्स टेररिस्ट्स में लिखते हैं कि भारत के विभा...

न समझोगे तो मिट जाओगे हिंदुस्तांवालो...

आशुतोष बीस साल बाद भी उस अस्सी साल के बुजुर्ग का चेहरा मैं भूल नहीं पाया। झुर्रियों से अटे उस चेहरे से भरभर टपकते आंसू और खरखराती आवाज। वो आवाज आज भी मेरे कानों में गूंजती है। 'आज राजीव गांधी होते तो अमर हो जाते'। अयोध्या में विवादित जमीन के पास शिलान्यास के करीब खड़े उस बुजुर्ग ने बड़ी मासूमियत से कहा था। मैंने बस इतना पूछा था-बाबा आपको कैसा लग रहा है। ये पूछना था कि वो फफक-फफक के रो पड़े। मैं उन दिनों जेएनयू में पढ़ रहा था। सीपीआई ने अयोध्या में रैली का आह्वान किया था। सी. राजेश्वर राव सीपीआई के जनरल सेक्रेटरी थे। मैं और सुहेल रैली में शामिल होने चल पड़े थे। रामजन्मभूमि के नाम पर संघ परिवार का उन्माद अपने उफान पर था। ट्रेन में कई बार मारपीट होते-होते बची थी। बचते-बचाते हम अयोध्या पहुंचे। स्टेशन से उतरकर पैदल ही हम बाबरी मस्जिद की तरफ बढ़े। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे थे सुहेल के चेहरे की लकीरें बदलती जा रहीं थी। अचानक एक मोड़ पर सुहेल रुका और बोला-मैं अब आगे नहीं जाऊंगा। तुम चले जाओ। डर तो मुझे भी लग रहा था। पर मैं आगे बढ़ता गया। और इन बुजुर्ग से मुलाकात हुई। बुजुर्ग की झुर्रिय...

माओवाद-मार्क्सवाद की अत्रप्त शवसाधना

आशुतोष 1990 में आधिकारिक तौर पर मार्क्सवाद की मौत हो गयी लेकिन उसके शव को लेकर अभी भी कुछ लोग घूम रहे हैं। लेनिन के रूस ने इस शव को दफन कर दिया है और माओ का चीन इस शव को भूल चुका है लेकिन इस देश में कुछ सिरफिरों को अभी भी लगता है कि मार्क्स की तंत्र साधना कर के इस शव में जान फूंकी जा सकती है। इसलिये किशन जी 2011 में कोलकाता में सशस्त्र क्रांति का सपना संजो रहे हैं। और पिछले दिनों दंतेवाड़ा के जंगलों में 76 जवानों का कत्ल कर के ये सोचने भी लगे हैं कि अब क्रांति दूर नहीं है और बहुत जल्द ही दिल्ली पर भी उनका कब्जा हो जायेगा। इन सिरफिरों के कुछ सिरफिरे दोस्त भी इसी यकीन पर कब्जा जमाये बैठे हैं और पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में जोर दे दे कर भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को बलात्कारी और कातिलों की जमात ठहराने के लिये अंग्रेजी और हिंदी के शब्दों का खूबसूरत इस्तेमाल भी करने लगे हैं। लेकिन ये भूल जाते हैं कि दिल्ली के आराम पंसद माहौल में रहकर नक्सलियों की वकालत करना आसान है लेकिन इस सचाई से रूबरू होना मुश्किल कि अगर य़े नक्सली वाकई में अपने मकसद में कामयाब हो गये तो सबसे पहले इनकी ही जुबान पर ताला लग...