तालिबान के साथ घमासान में पाक फौज को मिल रही सफलता पर अमेरिका इतरा रहा है। तालिबान अमेरिका के दुश्मन हैं जिसके खात्मे में उसके जवान शहीद नहीं हो रहे। यह लड़ाई पाकिस्तान अमेरिकी पैसों से लड़ रहा है। तालिबान पाक के भी दुश्मन हैं और धमाकों से परेशान पाक जनता भी अब यह समझ रही है। भारत भी खुश है कि पाकिस्तान आखिरकार तालिबान पर कार्रवाई कर रहा है। अफसोस ख़ुशी के ये दिन लंबे नहीं चलेंगे। कारण कि इस लड़ाई में सैद्धांतिक कमजोरी है। भूलना नहीं चाहिए कि जब तालिबान की कोपलें फूटीं, तब इसी खून से उसे सींचा गया था। वह मूर्त संगठन नहीं, एक सोच है जो विस्थापित अफगान पश्तूनों के बीच पनपी। उन पाक मदरसों में जो वहाबी संप्रदाय के पैसों से चलते थे। तब जमीन से बेदखल ये पश्तून शरणार्थी शिविरों में रह रहे थे। यहां मजहबी विचारधारा और पाक व अमेरिका द्वारा दी गई कलाश्निकोवों से लैस हुए और खून का बदला खून से लेकर काबुल में बैठ गए। पर बुरा हो खून के लज्जत की लत का। कब्जे में आने के बाद अफगानिस्तान मैदान नहीं रहा। लादेन ने फतह के लिए नई धरती दिखलाई। अमेरिकी सरजमीं पर अलकायदा के हमले के बाद से अमेरिका तालिबान का दुश...