Skip to main content

Posts

Showing posts with the label तेवरी
सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ गीतिका आचार्य संजीव 'सलिल' आते देखा खुदी को जब खुदा ही जाता रहा. गयी दौलत पास से क्या, दोस्त ही जाता रहा. दर्दे-दिल का ज़िक्र क्यों हो?, बात हो बेबात क्यों? जब ये सोचा बात का सब मजा ही जाता रहा. ठोकरें हैं राह का सच, पूछ लो पैरों से तुम. मिली सफरी तो सफर का स्वाद ही जाता रहा. चाँद को जब तक न देखा चाँदनी की चाह की. शमा से मिल शलभ का अरमान ही जाता रहा 'सलिल' ने मझधार में कश्ती को तैराया सदा. किनारों पर डूबकर सम्मान ही जाता रहा.. ***********************************

आखिर किसने मारा प्रो. सभरवाल को?

प्रोफेसर सभरवाल प्रकरण राजेश माली Senior Correspondent, Dainik Bhaskar 26 अगस्त 2006, यही वह दिन था जब उज्जैन के माधव कॉलेज में छात्रसंघ चुनाव कि प्रक्रिया के दौरान उपजी हिंसा की आग में प्रो एचएस सभरवाल को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। उस दिन कॉलेज में क्या हुआ, यह कई लोगों ने देखा। प्रोफेसरों को 'तुम्हें पोंछा लगाना पड़ेगा, परिणाम भुगतना पड़ेगा' जैसी धमकियां कैमरे के सामने देने वाले एबीवीपी के नेताओं का चेहरा टीवी चैनलों के माध्यम से पूरे देश ने देखा, लेकिन फिर भी सभी आरोपी बरी हो गए तो फिर प्रो. सभरवाल को किसने मारा? दरअसल इस प्रकरण के संभावित नतीजे का आभास तभी हो गया था जब 5 फरवरी 2007 को उज्जैन की जिला अदालत में गवाही के दौरान प्रमुख चश्मदीद कोमल सिंह जांच एजेंसी को दिए बयान से मुकर गया था। इसके बाद तो कुछ दूसरे गवाह भी कोमल सिंह की श्रेणी में आ गए जिन्हें अभियोजन पक्ष के आग्रह पर पक्ष विरोधी घोषित किया गया। इनमें तीन पुलिसकर्मी भी शामिल थे। जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मामला नागपुर ट्रांसफर हुआ तो जांच एजेंसी और अभियोजन पक्ष को अपनी गलतियां सुधारने का मौका मिला, लेकिन जा...

बॉलीवुड में कपड़े उतारने की होड़

दुर्गेश उपाध्याय बीबीसी संवाददाता, मुंबई बॉलीवुड अभिनेताओं में कपड़े उतारने की होड़ सी लग गई है और अब इसमें नया नाम जुड़ गया है नील नितिन मुकेश का . इस चलन की शुरुआत हुई सलमान ख़ान से जो मौक़ा मिलते ही अपनी क़मीज़ उतारने से नहीं चूकते. वहीं जॉन अब्राहम ने फ़िल्म 'दोस्‍ताना' में हद ही कर दी और उन्‍होंने तो अपनी पैंट तक उतार दी. ये तो थी पुरानी बात, लेकिन अब इस नंगेपन में नील नितिन मुकेश भी शामिल हो गए हैं. नील नितिन मुकेश ने वो कर दिखाया जिसे देखकर बॉलीवुड तो क्या हम और आप सकते में आ जाएंगे. नील नितिन मुकेश अपनी आने वाली फ़िल्म ‘जेल’ में दिखने वाले हैं बिल्कुल बिना कपड़ों के. विश्‍वास नहीं होता है लेकिन फ़िल्म की ये तस्वीर अब तो मीडिया में भी आ चुकी है. हाल ही में मीडिया से बातचीत में इस फ़िल्म के डाइरेक्टर मधुर भंडारकर ने बताया कि ये सीन काफ़ी सलीके से फ़िल्माया गया है और इसे देखकर कोई इसे भोंडा नहीं कह पाएगा. भई कुछ भी हो नील नितिन मुकेश की हिम्मत की दाद तो देनी ही पड़ेगी. *********************************************************** आगे पढ़ें के आगे यहाँ

गीतिका - आचार्य संजीव 'सलिल'

'सलिल' को दे दर्द अपने, चैन से सो जाइए. नर्मदा है नेह की, फसलें यहाँ बो जाइए. चंद्रमा में चांदनी भी और धब्बे-दाग भी. चन्दनी अनुभूतियों से पीर सब धो जाइए. होश में जब तक रहे, मैं-तुम न हम हो पाए थे. भुला दुनिया मस्त हो, मस्ती में खुद खो जाइए. खुदा बनने था चला, इंसा न बन पाया 'सलिल'. खुदाया अब आप ही, इंसान बन दिखलाइए. एक उँगली उठाता है जब भी गैरों पर; सलिल' तीन उँगली चीखती हैं, खुद सुधर कर आइए.

गीतिका : आचार्य संजीव 'सलिल'

चल पड़े अपने कदम तो,मंजिलें भी पायेंगे. कंठ-स्वर हो साज़ कोई, गीत अपने गायेंगे. मुश्किलों से दोस्ती है, संकटों से प्यार है. 'सलिल' बनकर नर्मदा हम, सत्य-शिव दुहारायेंगे. स्नेह की हर लहर हर-हर, कर निनादित हो रही. चल तनिक अवगाह लें, फिर सूर्य बनकर छायेंगे. दोस्तों की दुश्मनी की 'सलिल' क्यों चिंता करें. दुश्मनों की दोस्ती पाकर मरे- जी जायेंगे. चुनें किसको, तजें किसको, सब निकम्मे एक से. मिली सत्ता तो ज़मीं से, दूर हो गर्रायेंगे. दिल मिले न मिलें लेकिन हाथ तो मिलते रहें. क्या पता कब ह्रदय भी हों एक, फिर मुस्कायेंगे. स्नेह-सलिला में नहाना, 'सलिल' का मजहब धरम. सफल हो श्रम साधना, हम गगन पर लहरायेंगे.

प्यार की पाठशाला

घूमते-घूमते यूपी लाइव न्यूज़ पर पहुंची और एक अच्छी और बुरी दोनों खासियत वाली पोस्ट पर नजर पड़ गयी इसलिए यूपी लाइव न्यूज़ से साभार यहाँ प्रकाशित कर रही हूँ कुछ वर्ष पहले एक फिल्मी गाना सुना था कोलेज में होनी चाहिए प्यार की पढ़ाई ,हमें नही पता था की वो गाना आज के स्टुडेंट सच कर के ही रहेगे स्कूल ने प्यार को भले ही अपने सेलबुस में न रखा हो मगर विद्यार्थियों ने इस विषय को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में रखा है जिसे पढ़कर वो जीवन की परीक्षा पास करने का सपना दिन में और खुली आँखों से देख रहे है । माँ बाप के वो सपने जो उ न्होंने देखे,स्कूल में एक प्रेमी के बाहों में दम तोड़ दे रहे है ,प्यार करना ग़लत तो नही है लेकिन हर कम के लिए एक समय होता है लेकिन आज के बच्चो को भला सब्र कहा है । ये तस्वीरे साफ कह रही है की आज के स्टुडेंट kis तरह अपने पढ़ाई और अपने परिवार के प्रति बेईमानी कर रहे है और प्यार की ये पढ़ाई जब दुनियादारी की इम्तहान में फ़ैल कर देती है तो ये समाज को ही दोष देते फिरते है । इस तरह के लोग जो इसी तरह पढ़ा ई कर आए है और अब दर दर भटक रहे है महज एक नौकरी के लिए वो भी नही मिलती , भाई इस तरह ...
तेवरी आचार्य संजीव 'सलिल' खोटे सिक्के हैं प्रचलन में. खरे न बाकी रहे चलन में. मन से मन का मिलन उपेक्षित. तन को तन की चाह लगन में. अनुबंधों के प्रतिबंधों से- संबंधों का सूर्य गहन में. होगा कभी, न अब बाकी है. रिश्ता कथनी औ' करनी में. नहीं कर्म की चिंता किंचित- फल की चाहत छिपी जतन में. मन का मीत बदलता पाया. जब भी देखा मन दरपन में. राम कैद ख़ुद शूर्पणखा की, भरमाती मादक चितवन में. स्नेह-'सलिल' की निर्मलता को- मिटा रहे हम अपनेपन में. * * * * * समन्वयम, २०४ विजय अपार्टमेन्ट, नेपियर टाऊन, जबलपुर ४८२००१ vaartaa : ०७६१-२४१११३१, चलभाष: 0९४२५१ ८३२४४ई मेल: सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम , ब्लॉग: संजिवसलिल.ब्लागस्पा ट.com