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हास्य मुक्तिका: ...छोड़ दें?? -- संजीव 'सलिल'

हास्य मुक्तिका: ...छोड़ दें?? संजीव 'सलिल' * वायदों का झुनझुना हम क्यों बजाना छोड़ दें? दिखा सपने आम जन को क्यों लुभाना छोड़ दें?? गलतियों पर गलतियाँ कर-कर छिपाना छोड़ दें? दूसरों के गीत अपने कह छपाना छोड़ दें?? उठीं खुद पर तीन उँगली उठें परवा है नहीं एक उँगली आप पर क्यों हम उठाना छोड़ दें?? नहीं भ्रष्टाचार है, यह महज शिष्टाचार है. कह रहे अन्ना कहें, क्यों घूस खाना छोड़ दें?? पूजते हैं मंदिरों में, मिले राहों पर अगर. तो कहो क्यों छेड़ना-सीटी बजाना छोड़ दें?? गर पसीना बहाना है तो बहायें आम जन. ख़ास हैं हम, कहें क्यों करना बहाना छोड़ दें??   राम मुँह में, छुरी रखना बगल में विरसा 'सलिल' सिया को बेबात जंगल में पठाना छोड़ दें?? बुढाया है तन तो क्या? दिल है जवां  अपना 'सलिल' पड़ोसन को देख कैसे मुस्कुराना छोड़ दें? हैं 'सलिल' नादान क्यों दाना कहाना छोड़ दें?  रुक्मिणी पा गोपियों को क्यों भुलाना छोड़ दें?? Acharya Sanjiv verma 'Salil' http://divyanarmada.blogspot. com http://hindihindi.in

नवगीत : ओढ़ कुहासे की चादर संजीव वर्मा 'सलिल'

नवगीत :  ओढ़ कुहासे की चादर  संजीव वर्मा 'सलिल' * ओढ़ कुहासे की चादर, धरती लगाती दादी। ऊँघ रहा सतपुडा, लपेटे मटमैली खादी... * सूर्य अंगारों की सिगडी है, ठण्ड भगा ले भैया। श्वास-आस संग उछल-कूदकर नाचो ता-ता थैया। तुहिन कणों को हरित दूब, लगती कोमल गादी... * कुहरा छाया संबंधों पर, रिश्तों की गरमी पर। हुए कठोर आचरण अपने, कुहरा है नरमी पर। बेशरमी नेताओं ने, पहनी-ओढी-लादी... * नैतिकता की गाय काँपती, संयम छत टपके। हार गया श्रम कोशिश कर, कर बार-बार अबके। मूल्यों की ठठरी मरघट तक, ख़ुद ही पहुँचा दी... * भावनाओं को कामनाओं ने, हरदम ही कुचला। संयम-पंकज लालसाओं के पंक-फँसा-फिसला। अपने घर की अपने हाथों कर दी बर्बादी... * बसते-बसते उजड़ी बस्ती, फ़िर-फ़िर बसना है। बस न रहा ख़ुद पर तो, परबस 'सलिल' तरसना है। रसना रस ना ले, लालच ने लज्जा बिकवा दी... * हर 'मावस पश्चात् पूर्णिमा लाती उजियारा। मृतिका दीप काटता तम् की, युग-युग से कारा। तिमिर पिया, दीवाली ने जीवन जय गुंजा दी... *****

मुक्तिका: सच्चा नेह ---संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:                                                                                                                                       सच्चा नेह संजीव 'सलिल' * तुमने मुझसे सच्चा नेह लगाया था. पीट ढिंढोरा जग को व्यर्थ बताया था.. मेरे शक-विश्वास न तुमको ज्ञात तनिक. सत-शिव-सुंदर नहीं पिघलने पाया था.. पूजा क्यों केवल निज हित का हेतु बनी? तुझको भरमाता तेरा ही साया था.. चाँद दिखा आकर्षित तुझको किया तभी गीत चाँदनी का तूने रच-गाया था.. माँगा हिन्दी का, पाया अंग्रेजी का फूल तभी तो पैरों तले दबाया था.. प्रीत अमिय संदेह ज़हर है सच मानो. इसे हृदय में उसको कंठ बसाया था.. जूठा-मैला किया तुम्हींने, निर्मल था व्यथा-कथा को नहीं...

मुक्तिका: फिर ज़मीं पर..... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका: फिर ज़मीं पर..... संजीव 'सलिल' * फिर ज़मीं पर कहीं काफ़िर कहीं क़ादिर क्यों है? फिर ज़मीं पर कहीं नाफ़िर कहीं नादिर क्यों है? * फिर ज़मीं पर कहीं बे-घर कहीं बा-घर क्यों है? फिर ज़मीं पर कहीं नासिख कहीं नाशिर क्यों है? * चाहते हम भी तुम्हें चाहते हो तुम भी हमें. फिर ज़मीं पर कहीं नाज़िल कहीं नाज़िर क्यों है? * कौन किसका है सगा और किसे गैर कहें? फिर ज़मीं पर कहीं ताइर कहीं ताहिर क्यों है? * धूप है, छाँव है, सुख-दुःख है सभी का यक सा. फिर ज़मीं पर कहीं तालिब कहीं ताजिर क्यों है? * ज़र्रे -ज़र्रे में बसा वो न 'सलिल' दिखता है. फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं  मंदिर क्यों है? * पानी जन आँख में बाकी न 'सलिल' सूख गया. फिर ज़मीं पर कहीं सलिला कहीं सागर क्यों है? * -- दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम कुछ शब्दों के अर्थ : काफ़िर = नास्तिक, धर्मद्वेषी, क़ादिर = समर्थ, ईश्वर, नाफ़िर = घृणा करनेवाला, नादिर = श्रेष्ठ, अद्भुत, बे-घर = आवासहीन, बा-घर = घर वाला, जिसके पास घर हो, नासिख = लिखनेवाला,  नाशिर = प्रकाशित करनेवाला, नाज़िल = मुसीबत, नाज़ि...

मुक्तिका : संजीव 'सलिल'

मुक्तिका : संजीव 'सलिल' * काम रहजन का करे नाम से रहबर क्यों है? मौला इस देश का नेता हुआ कायर क्यों है?? खोल अखबार- खबर सच से बेखबर क्यों है? फिर जमीं पर कहीं मस्जिद, कहीं मंदर क्यों है? जो है खूनी उकाब उसको अता की ताकत. भोला-मासूम परिंदा नहीं जबर क्यों है?? जिसने पैदा किया तुझको तेरी औलादों को. आदमी के लिए औरत रही चौसर क्यों है?? एक ही माँ ने हमें दूध पिलाकर पाला. पीठ हिन्दोस्तां की पाक का खंजर क्यों है?? लाख खाता है कसम रोज वफ़ा की आदम. कर न सका आज तलक बोल तो जौहर क्यों है?? पेट पलता है तेरा और मेरा भी जिससे- कामचोरी की जगह, बोल ये दफ्तर क्यों है?? ना वचन सात, ना फेरे ही लुभाते तुझको. राह देखा किया जिसकी तू, वो कोहबर क्यों है?? हर बशर चाहता औरत तो पाक-साफ़ रहे. बाँह में इसको लिए, चाह में गौहर क्यों है?? पढ़ के पुस्तक कोई नादान से दाना न हुआ. ढाई आखर न पढ़े, पढ़ के निरक्षर क्यों है?? फ़ौज में क्यों नहीं नेताओं के बेटे जाते? पूछा जनता ने तो नेता जी निरुत्तर क्यों है?? बूढ़े माँ-बाप की खातिर न जगह है दिल में. काट-तन-पेट खड़ा तुमने किया घर क्यों है?...

कविता: जीवन अँगना को महकाया -संजीव 'सलिल'

कविता: जीवन अँगना को महकाया संजीव 'सलिल' * * जीवन अँगना को महकाया श्वास-बेल पर खिली कली की स्नेह-सुरभि ने. कली हँसी तो फ़ैली खुशबू स्वर्ग हुआ घर. कली बने नन्हीं सी गुडिया. ममता, वात्सल्य की पुडिया. शुभ्र-नर्म गोला कपास का, किरण पुंज सोनल उजास का. उगे कली के हाथ-पैर फिर उठी, बैठ, गिर, खड़ी हुई वह. ठुमक-ठुमक छन-छननन-छनछन अँगना बजी पैंजन प्यारी दादी-नानी थीं बलिहारी. * कली उड़ी फुर्र... बनकर बुलबुल पा मयूर-पंख हँस-झूमी. कोमल पद, संकल्प ध्रुव सदृश नील-गगन को देख मचलती आभा नभ को नाप रही थी. नवल पंखुडियाँ ऊगीं खाकी मुद्रा-छवि थी अब की बाँकी. थाम हाथ में बड़ी रायफल कली निशाना साध रही थी. छननन घुँघरू, धाँय निशाना ता-ता-थैया, दायें-बायें लास-हास, संकल्प-शौर्य भी कली लिख रही नयी कहानी बहे नर्मदा में ज्यों पानी. बाधाओं की श्याम शिलाएँ संगमरमरी शिला सफलता कोशिश धुंआधार की धरा संकल्पों का सुदृढ़ किनारा. * कली न रुकती, कली न झुकती, कली न थकती, कली न चुकती. गुप-चुप, गुप-चुप बहती जाती. नित नव मंजिल गहती जाती. कली हँसी पुष्पायी आशा. सफल साधना, फलित ...

मुक्तिका: किस चरण का अनुकरण --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका: किस चरण का अनुकरण संजीव 'सलिल' * किस चरण का अनुकरण जन-जन करे. हर चरण के आचरण हैं जब बुरे.. गले मिलते मुस्कुराते मीत कह पीठ पीछे हाथ में थामे छुरे.. हैं बुरे, बनते भले जो आजकल. हैं भले जो आजकल लगते बुरे.. मायके में गुजर कब किसकी हुई? खोज प्रियतम को चलो अब सासरे.. सच कहो तो मानते सब गैर हैं. कहें मनचाही वही हैं खास रे.. बढ़ी है सुविधाएँ, वैभव, कीर्ति, धन. पर आधार से गुम गया है हास रे.. साँस तेरा साथ चाहे छोड़ दे. 'सलिल' जीते जी न तजना आस रे.. ************************** दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

मुक्तिका ......... बात करें संजीव 'सलिल'

मुक्तिका ......... बात करें संजीव 'सलिल' * * बात न मरने की अब होगी, जीने की हम बात करें. हम जी ही लेंगे जी भरकर, अरि मरने की बात करें. जो कहने की हो वह करने की भी परंपरा डालें. बात भले बेबात करें पर मौन न हों कुछ बात करें.. नहीं सियासत हमको करनी, हमें न कोई चिंता है. फर्क न कुछ, सुनिए मत सुनिए, केवल सच्ची बात करें.. मन से मन पहुँच सके जो, बस ऐसा ही गीत रचें. कहें मुक्तिका मुक्त हृदय से, कुछ करने की बात करें.. बात निकलती हैं बातों से, बात बात तक जाती है. बात-बात में बात बनायें, बात न करके बात करें.. मात-घात की बात न हो अब, जात-पांत की बात न हो. रात मौन की बीत गयी है, तात प्रात की बात करें.. पतियाते तो डर जाते हैं, बतियाते जी जाते हैं. 'सलिल' बात से बात निकालें, मत मतलब की बात करें.. *************** Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com

नव गीत: हम खुद को.... संजीव 'सलिल'

नव गीत: हम खुद को.... संजीव 'सलिल' * * हम खुद को खुद ही डंसते हैं... * जब औरों के दोष गिनाये. हमने अपने ऐब छिपाए. विहँस दिया औरों को धोखा- ठगे गए तो अश्रु बहाये. चलते चाल चतुर कह खुद को- बनते मूर्ख स्वयं फंसते हैं... * लिये सुमिरनी माला फेरें. मन से प्रभु को कभी न टेरें. जब-जब आपद-विपदा घेरें- होकर विकल ईश-पथ हेरें. मोह-वासना के दलदल में संयम रथ पहिये फंसते हैं.... * लगा अल्पना चौक रंगोली, फैलाई आशा की झोली. त्योहारों पर हँसी-ठिठोली- करे मनौती निष्ठां भोली. पाखंडों के शूल फूल की क्यारी में पाये ठंसते हैं..... * पुरवैया को पछुआ घेरे. दीप सूर्य पर आँख तरेरे. तड़ित करे जब-तब चकफेरे नभ पर छाये मेघ घनेरे. आशा-निष्ठां का सम्बल ले हम निर्भय पग रख हँसते हैं..... **************** Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com

कथा-गीत: मैं बूढा बरगद हूँ यारों... ---संजीव 'सलिल'

कथा-गीत: मैं बूढा बरगद हूँ यारों... ---संजीव 'सलिल' कथा-गीत: मैं बूढा बरगद हूँ यारों... संजीव 'सलिल' * * मैं बूढा बरगद हूँ यारों... है याद कभी मैं अंकुर था. दो पल्लव लिए लजाता था. ऊँचे वृक्षों को देख-देख- मैं खुद पर ही शर्माता था. धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ. शाखें फैलीं, पंछी आये. कुछ जल्दी छोड़ गए मुझको- कुछ बना घोंसला रह पाये. मेरे कोटर में साँप एक आ बसा हुआ मैं बहुत दुखी. चिड़ियों के अंडे खाता था- ले गया सपेरा, किया सुखी. वानर आ करते कूद-फांद. झकझोर डालियाँ मस्ताते. बच्चे आकर झूला झूलें- सावन में कजरी थे गाते. रातों को लगती पंचायत. उसमें आते थे बड़े-बड़े. लेकिन वे मन के छोटे थे- झगड़े ही करते सदा खड़े. कोमल कंठी ललनाएँ आ बन्ना-बन्नी गाया करतीं. मागरमाटी पर कर प्रणाम- माटी लेकर जाया करतीं. मैं सबको देता आशीषें. सबको दुलराया करता था. सबके सुख-दुःख का साथी था- सबके सँग जीता-मरता था. है काल बली, सब बदल गया. कुछ गाँव छोड़कर शहर गए. कुछ राजनीति में डूब गए- घोलते फिजां में ज़हर गए. जंगल काटे, पर्वत खोदे. सब ताल-तलैयाँ पूर ...

शराब की दूकानों का ठेका लेने महिलाओं के हजारों आवेदन.

खबर: शराब की दूकानों का ठेका लेने महिलाओं के हजारों आवेदन. आपकी राय ? मधुशाला को मधुबाला ने निशा निमंत्रण भेजा है. पीनेवालों समाचार क्या तुमने देख सहेजा है? दूना नशा मिलेगा तुमको आँखोंसे औ' प्याले से. कैसे सम्हाल सकेगा बोलो इतना नशा सम्हाले से? * आचार्य संजीव सलिल / http://दिव्यनर्मदा.ब्लॉगस्पोट.कॉम

नवगीत: आओ! तम से लड़ें... --संजीव 'सलिल'

नवगीत: चलो! कुछ गायें... संजीव 'सलिल' क्यों है मौन? चलो कुछ गायें... * माना अँधियारा गहरा है. माना पग-पग पर पहरा है. माना पसर चुका सहरा है. माना जल ठहरा-ठहरा है. माना चेहरे पर चेहरा है. माना शासन भी बहरा है. दोषी कौन?... न शीश झुकायें. क्यों है मौन? चलो कुछ गायें... * सच कौआ गा रहा फाग है. सच अमृत पी रहा नाग है. सच हिमकर में लगी आग है. सच कोयल-घर पला काग है. सच चादर में लगा दाग है. सच काँटों से भरा बाग़ है. निष्क्रिय क्यों? परिवर्तन लायें. क्यों है मौन? चलो कुछ गायें... * Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com

काव्य रचना: मुस्कान --संजीव 'सलिल'

काव्य रचना: मुस्कान संजीव 'सलिल' जिस चेहरे पर हो मुस्कान, वह लगता हमको रस-खान.. अधर हँसें तो लगता है- हैं रस-लीन किशन भगवान.. आँखें हँसती तो दिखते - उनमें छिपे राम गुणवान.. उमा, रमा, शारदा लगें रस-निधि कोई नहीं अनजान.. 'सलिल' रस कलश है जीवन सुख देकर बन जा इंसान.. ***********************

नवगीत : घाव कितने?...... --संजीव 'सलिल'

गीत संजीव 'सलिल' * वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... * हम समझ ही नहीं पाए कौन क्या है? और तुमने यह न समझा मौन क्या है? साथ रहकर भी रहे क्यों दूर हरदम? कौन जाने हैं अजाने भाव कितने? वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... * चाहकर भी तुम न हमको चाह पाए. दाहकर भी हम न तुमको दाह पाए. बाँह में थी बाँह लेकिन राह भूले- छिपे तन-मन में रहे अलगाव कितने? वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... * अ-सुर-बेसुर से नहीं, किंचित शिकायत. स-सुर सुर की भुलाई है क्यों रवायत? नफासत से जहालत क्यों जीतती है? बगावत क्यों सह रही अभाव इतने? वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... * खड़े हैं विषधर, चुनें तो क्यों चुनें हम? नींद गायब तो सपन कैसे बुनें हम? बेबसी में शीश निज अपना धुनें हम- भाव नभ पर, धरा पर बेभाव कितने? वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... * साँझ सूरज-चंद्रमा सँग खेलती है. उषा रुसवाई, न कुछ कह झेलती है. हजारों तारे निशा के दिवाने है- 'सलिल' निर्मल पर पड़े प्रभाव कितने? वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... *************** Acharya...

हाइकु गजल : संजीव 'सलिल'

आया वसंत, / इन्द्रधनुषी हुए / दिशा-दिगंत.. शोभा अनंत / हुए मोहित, सुर / मानव संत.. * प्रीत के गीत / गुनगुनाती धूप / बनालो मीत. जलाते दिए / एक-दूजे के लिए / कामिनी-कंत.. * पीताभी पर्ण / संभावित जननी / जैसे विवर्ण.. हो हरियाली / मिलेगी खुशहाली / होगे श्रीमंत.. * चूमता कली / मधुकर गुंजार / लजाती लली.. सूरज हुआ / उषा पर निसार / लाली अनंत.. * प्रीत की रीत / जानकार न जाने / नीत-अनीत. क्यों कन्यादान? / 'सलिल' वरदान / दें एकदंत.. **********************

मुक्तक / चौपदे आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

मुक्तक / चौपदे आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' संजिव्सलिल.ब्लागस्पाट.कॉम / संजिव्सलिल.ब्लॉग.सीओ.इन सलिल.संजीव@जीमेल.com साहित्य की आराधना आनंद ही आनंद है. काव्य-रस की साधना आनंद ही आनंद है. 'सलिल' सा बहते रहो, सच की शिला को फोड़कर. रहे सुन्दर भावना आनंद ही आनंद है. **************************** ll नव शक संवत, आदिशक्ति का, करिए शत-शत वन्दन ll ll श्रम-सीकर का भारत भू को, करिए अर्पित चन्दन ll ll नेह नर्मदा अवगाहन कर, सत-शिव-सुन्दर ध्यायें ll ll सत-चित-आनंद श्वास-श्वास जी, स्वर्ग धरा पर लायें ll **************** दिल को दिल ने जब पुकारा, दिल तड़प कर रह गया. दिल को दिल का था सहारा, दिल न कुछ कह कह गया. दिल ने दिल पर रखा पत्थर, दिल से आँखे फेर लीं- दिल ने दिल से दिल लगाया, दिल्लगी दिल सह गया. ****************************************** कर न बेगाना मुझे तू, रुसवा ख़ुद हो जाएगा. जिस्म में से जाँ गयी तो बाकी क्या रह जाएगा? बन समंदर तभी तो दुनिया को कुछ दे पायेगा- पत्थरों पर 'सलिल' गिरकर व्यर्थ ही बह जाएगा. ***...
गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत: सारा का सारा हिंदी है आचार्य संजीव 'सलिल' * जो कुछ भी इस देश में है, सारा का सारा हिंदी है. हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है.... मणिपुरी, कथकली, भरतनाट्यम, कुचपुडी, गरबा अपना है. लेजिम, भंगड़ा, राई, डांडिया हर नूपुर का सपना है. गंगा, यमुना, कावेरी, नर्मदा, चनाब, सोन, चम्बल, ब्रम्हपुत्र, झेलम, रावी अठखेली करती हैं प्रति पल. लहर-लहर जयगान गुंजाये, हिंद में है और हिंदी है. हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है.... मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजा सबमें प्रभु एक समान. प्यार लुटाओ जितना, उतना पाओ औरों से सम्मान. स्नेह-सलिल में नित्य नहाकर, निर्माणों के दीप जलाकर. बाधा, संकट, संघर्षों को गले लगाओ नित मुस्काकर. पवन, वन्हि, जल, थल, नभ पावन, कण-कण तीरथ, हिंदी है. हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है.... जै-जैवन्ती, भीमपलासी, मालकौंस, ठुमरी, गांधार. गजल, गीत, कविता, छंदों से छलक रहा है प्यार अपार. अरावली, सतपुडा, हिमालय, मैकल, विन्ध्य, उत्तुंग शिखर. ठहरे-ठहरे गाँव हमारे...

बासंती दोहा ग़ज़ल -संजीव 'सलिल'

बासंती दोहा ग़ज़ल संजीव 'सलिल' स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित हैं कचनार. किंशुक कुसुम विहंस रहे या दहके अंगार.. पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार. पवन खो रहा होश है, लख वनश्री श्रृंगार.. महुआ महका देखकर, बहका-चहका प्यार. मधुशाला में बिन पिए' सर पर नशा सवार.. नहीं निशाना चूकती, पञ्च शरों की मार. पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार.. नैन मिले लड़ झुक उठे, करने को इंकार. देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार.. मैं तुम यह वह ही नहीं, बौराया संसार. ऋतु बसंत में मन करे, मिल में गले, खुमार.. ढोलक टिमकी मंजीरा, करें ठुमक इसरार. तकरारों को भूलकर, नाचो गाओ यार.. घर आँगन तन धो लिया, सचमुच रूप निखार. अपने मन का मेल भी, हँसकर 'सलिल' बुहार.. बासंती दोहा ग़ज़ल, मन्मथ की मनुहार. सूरत-सीरत रख 'सलिल', निएमल-विमल सँवार.. ************************************ दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

मुक्तिका: खुशबू --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका खुशबू संजीव 'सलिल' कहीं है प्यार की खुशबू, कहीं तकरार की खुशबू.. कभी इंकार की खुशबू, कभी इकरार की खुशबू.. सभी खुशबू के दीवाने हुए, पीछे रहूँ क्यों मैं? मुझे तो भा रही है यार के दीदार की खुशबू.. सभी कहते न लेकिन चाहता मैं ठीक हो जाऊँ. उन्हें अच्छी लगे है दिल के इस बीमार की खुशबू. तितलियाँ फूल पर झूमीं, भ्रमर यह देखकर बोला. कभी मुझको भी लेने दो दिले-गुलज़ार की खुशबू. 'सलिल' थम-रुक न झुक-चुक, हौसला रख हार को ले जीत. रहे हर गीत में मन-मीत के सिंगार की खुशबू.. ****************

नर्मदा नामावली आचार्य संजीव 'सलिल'

नर्मदा नामावली आचार्य संजीव 'सलिल' पुण्यतोया सदानीरा नर्मदा. शैलजा गिरिजा अनिंद्या वर्मदा. शैलपुत्री सोमतनया निर्मला. अमरकंटी शांकरी शुभ शर्मदा. आदिकन्या चिरकुमारी पावनी. जलधिगामिनी चित्रकूटा पद्मजा. विमलहृदया क्षमादात्री कौतुकी. कमलनयनी जगज्जननि हर्म्यदा. शाशिसुता रौद्रा विनोदिनी नीरजा. मक्रवाहिनी ह्लादिनी सौंदर्यदा. शारदा वरदा सुफलदा अन्नदा. नेत्रवर्धिनि पापहारिणी धर्मदा. सिन्धु सीता गौतमी सोमात्मजा. रूपदा सौदामिनी सुख-सौख्यदा. शिखरिणी नेत्रा तरंगिणी मेखला. नीलवासिनी दिव्यरूपा कर्मदा. बालुकावाहिनी दशार्णा रंजना. विपाशा मन्दाकिनी चित्रोंत्पला. रुद्रदेहा अनुसूया पय-अंबुजा. सप्तगंगा समीरा जय-विजयदा. अमृता कलकल निनादिनी निर्भरा. शाम्भवी सोमोद्भवा स्वेदोद्भवा. चन्दना शिव-आत्मजा सागर-प्रिया. वायुवाहिनी कामिनी आनंददा. मुरदला मुरला त्रिकूटा अंजना. नंदना नाम्माडिअस भव मुक्तिदा. शैलकन्या शैलजायी सुरूपा. विपथगा विदशा सुकन्या भूषिता. गतिमयी क्षिप्रा शिवा मेकलसुता. मतिमयी मन्मथजयी लावण्यदा. रतिमयी उन्मादिनी वैराग्यदा. यतिम...