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Showing posts with the label इमरान हाशमी

धन हमें कहां ले जाता है!

इस संसार में सर्वाधिक प्रेम, स्वप्न, विवाद और फैंटेसी जिस चीज के इर्द-गिर्द घूमते हैं, वह है धन। धन सुख है, आराम है, धन खुशियों की राह खोलता है। धन बहुत कुछ है, लेकिन धन सबकुछ नहीं है। वह एक राह है, मंजिल नहीं, लेकिन राह भी कम महत्वपूर्ण नहीं होती। हमारे देश में पैसे को लेकर दो तरह के दृष्टिकोण नजर आते हैं। हम धन को बुरा भी कहते हैं और उसी धन की मन ही मन कामना भी करते हैं। एक तरफ तो वे हैं, जिनके पास अथाह धन है और वे निरंतर उस धन को दुगुना और तिगुना करने को लेकर चिंतित रहते हैं, लेकिन वे अपनी संपत्ति दूसरों के साथ बांटना नहीं चाहते। इसी के परिणामस्वरूप समाज में धन को लेकर एक दूसरा दर्शन विकसित होता है, जो एक खास वर्ग को यह सिखाता है कि संतोषी सदा सुखी यानी संतुष्टि में ही जीवन का सबसे बड़ा सुख है। आपके पास धन नहीं है, संतोष करिए। अभाव है, संतोष करिए। एक व्यक्ति दोनों हाथों से दुनिया का सारा धन बटोरता जाता है और दूसरों को उपदेश देता है कि संतोष करो। इसी के साथ पूर्वजन्म और कर्मफल का दर्शन विकसित होता है। कोई भिखारी है तो यह उसके पूर्वजन्म के कर्मो का फल है। वे कहते हैं, धन की कामना ही ब...

'हां, भारत में मुसलमानों के साथ पक्षपात होता है

सलीम अख्तर सिद्दीक़ी इमरान हाशमी का आरोप है कि की मुंबई की एक हाउसिंग सोसायटी ने उसे इसलिए मकान नहीं दिया कि वह मुसलमान हैं। इस पर तर्रा यह कि अब इमरान हाशमी के खिलाफ ही कानूनी कार्यवाई की जा रही है। इमरान हाशमी प्रकरण के बहाने इस बहस को फिर से चर्चा में ला दिया है कि क्या भारत में मुसलमानों के साथ पक्षपात होता है। अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि हां, भारत में मुसलमानों के साथ पक्षपात होता है। मैं खुद इसका भुक्तभोगी हूं। अब से लगभग चार साल पहले मेरठ के एक कॉम्प्लेक्स में मुझे ऑफिस बनाने के लिए दुकान किराए पर इसलिए नहीं दी गयी थी क्योंकि मेरा नाम सलीम अख्तर सिददीकी था। हालांकि दुकान मालिक से सभी बातें तय हो गयीं थी, लेकिन जब एग्रीमेंट के लिए नाम और पता लिखा जाने लगा तो दुकान मालिक के रवैये में फौरन बदलाव आ गया। वह कहने लगा कि मैं अपने बेटे से सलाह कर लूं हो सकता है कि उसने किसी और से बात कर ली हो। मैं समझ चुका था क्या हो गया है। मैं दोबारा पलट कर वहां नहीं गया। लेकिन सुखद बात यह रही कि दूसरी जगह एक हिन्दू ने यह कहकर मुझे अपनी दुकान फौरन दे दी कि मुझे हिन्दु-मुसलमान से कोई फर्क नहीं पड़ता। हा...