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मनोरंजन की जरुरत और अनछुई हकीकत

संजय सेन सागर मनोरंजन का वैश्विक परिवेश मनोरंजन का वैश्विक परिवेश इतना व्यापक हो चुका है कि इसकी व्यापकता को सरहद या संस्कृति की भिन्नता की बजह से दवाया नही जा सकता, मनोरंजन का प्रसार खुले आसमा की विशालता को भी खुद में समेटता जा रहा है, मनोरंजन की महक और आकर्षित करने वाली तीव्र तरंगे आज सीधे हदृय से जुड़ चुकी है, नतीजन मनोरंजन के बढ़ते प्रकार, बढ़ती महत्वता एवं वेगशील प्रगति प्रतिबिम्बित हो रही है। मनोरंजन आज जिन्दगी का प्रमुख भाग बन गया है। रोजमर्रा की व्यस्त एवं गतिशील जिंदगी में भी मनोरंजन का एक स्थान स्थित एवं नियत है। मनोरंजन की महत्वता का ग्राफ वर्तमान स्थितियों में लगातार बढ़ रहा है, लेकिन मनोरंजन को लेकर जिस तरह से प्राचीन सभ्यता में जो ललक एवं नवीनीकरण का आभास होता था उसी की बदोलत आज मनोरंजन को इस हद तक स्वीकार किया जा रहा है। आज मनोरंजन का संपूर्ण परिवेश बदल चुका है लेकिन कही न कही इसका जुड़ाव एवं आधार शिला प्राचीन सभ्यता के निशां का अहसास कराती है, यह कहना गलत ना होगा की प्राचीन सभ्यता ने ही आधुनिक मनोरंजन को जन्म दिया है और प्राचीन मनोरंजक साधनों ने ही आधुनिक साधनों का ...