नव गीत: हम खुद को.... संजीव 'सलिल' * * हम खुद को खुद ही डंसते हैं... * जब औरों के दोष गिनाये. हमने अपने ऐब छिपाए. विहँस दिया औरों को धोखा- ठगे गए तो अश्रु बहाये. चलते चाल चतुर कह खुद को- बनते मूर्ख स्वयं फंसते हैं... * लिये सुमिरनी माला फेरें. मन से प्रभु को कभी न टेरें. जब-जब आपद-विपदा घेरें- होकर विकल ईश-पथ हेरें. मोह-वासना के दलदल में संयम रथ पहिये फंसते हैं.... * लगा अल्पना चौक रंगोली, फैलाई आशा की झोली. त्योहारों पर हँसी-ठिठोली- करे मनौती निष्ठां भोली. पाखंडों के शूल फूल की क्यारी में पाये ठंसते हैं..... * पुरवैया को पछुआ घेरे. दीप सूर्य पर आँख तरेरे. तड़ित करे जब-तब चकफेरे नभ पर छाये मेघ घनेरे. आशा-निष्ठां का सम्बल ले हम निर्भय पग रख हँसते हैं..... **************** Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com