दिनेश काण्डपाल, एंकर, वॉयस ऑफ इंडिया लोक सभा चुनाव के नतीजे आने में ज़्यादा वक्त नहीं रह गया है। इस वक्त देश की जनता किसी एक पार्टी को तो छोड़िये घठबंधन को भी बहुमत देने के मूड में नहीं है। इसी से अनुमान लगा कर इस चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की लिस्ट लम्बी होती जा रही है। सावल ये है कि अगर दलित के नाम पर प्रधानमंत्री पद के दावेदार की बात आती है तो मायावती ही एक मात्र विकल्प हैं। मायावती के सामने सीना ताने राम विलास पासवान भी खड़े हैं। राम विलास पासवान का राजनीतिक अनुभव और उनका धुरंधर तिकड़मी अन्दाज़ उन्हैं मायावती से काफी आगे ले जाता है। माया को भरोसा है संख्या बल पर। अगर बीएसपी की सीटें ज़्यादा आती हैं तो मायावती की दावेदारी पुख्ता होती है, इसके अलावा मायावती के भरोसे की दूसरी चीज़ क्या है? मायावती के अगर अपनी सीटों का दबाव ना बनाये तो वो उम्मीदवारी की रेस में ही नहीं आती हैं। राजनीतिक अनुभव हो या फिर केन्द्रीय स्तर पर राजनीतिक क़द। राम विलास पासवान हर मोर्चे पर मायावती पर भारी पड़ते हैं। राम विलास पासवान तो ऐसे नेता हैं जो विना अपनी पार्टी की ताकत के बड़े बड़े गुण रखते है...