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रामविलास पासवान प्रधानमंत्री बन सकते हैं

दिनेश काण्डपाल, एंकर, वॉयस ऑफ इंडिया लोक सभा चुनाव के नतीजे आने में ज़्यादा वक्त नहीं रह गया है। इस वक्त देश की जनता किसी एक पार्टी को तो छोड़िये घठबंधन को भी बहुमत देने के मूड में नहीं है। इसी से अनुमान लगा कर इस चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की लिस्ट लम्बी होती जा रही है। सावल ये है कि अगर दलित के नाम पर प्रधानमंत्री पद के दावेदार की बात आती है तो मायावती ही एक मात्र विकल्प हैं। मायावती के सामने सीना ताने राम विलास पासवान भी खड़े हैं। राम विलास पासवान का राजनीतिक अनुभव और उनका धुरंधर तिकड़मी अन्दाज़ उन्हैं मायावती से काफी आगे ले जाता है। माया को भरोसा है संख्या बल पर। अगर बीएसपी की सीटें ज़्यादा आती हैं तो मायावती की दावेदारी पुख्ता होती है, इसके अलावा मायावती के भरोसे की दूसरी चीज़ क्या है? मायावती के अगर अपनी सीटों का दबाव ना बनाये तो वो उम्मीदवारी की रेस में ही नहीं आती हैं। राजनीतिक अनुभव हो या फिर केन्द्रीय स्तर पर राजनीतिक क़द। राम विलास पासवान हर मोर्चे पर मायावती पर भारी पड़ते हैं। राम विलास पासवान तो ऐसे नेता हैं जो विना अपनी पार्टी की ताकत के बड़े बड़े गुण रखते है...

मां के आंसुओं का जवाब जनता क्यों देगी वरुण ?

दिनेश काण्डपाल जी वॉयस ऑफ इंडिया में एंकर है और आप इनके लेखन की भाषाशैली और सटीकता इनके इस लेख को पढ़कर भली-भांति समझ जायेंगे !हमारे अतिथि लेखक दिनेश काण्डपाल जी यह लेख ''हिन्दुस्तान का दर्द'' के लिए लिखा है इस लेख पर आपकी राय आमंत्रित है,आलोचना भी स्वीकार है ! क्यों भई वरुण गांधी ? मां के आंसुओं का हिसाब जनता क्यों देगी? क्या ये आंसू करगिल में शहीद हुये कैप्टन सौरव कालिया की मां के हैं? या कैप्टन विक्रम बत्रा की मां रो रही हैं जिनका बेटा करगिल जीत कर शहीद हो गया। इन बहादुरों की मांताओं की आंखों से आंसूं नहीं निकलते। मुम्बई हमले के बाद एनएसजी के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की मां की आंखें याद हैं आपको, वो बहादुर बेटे की मां हैं। आंसू टपका कर ये अपने बेटे के शौर्य को कम नहीं करतीं। ये मांताऐं बेहद खामोशी और दृढ़ता से फिर से ऐसे ही शूरवीर बनाने में जुट जाती हैं जो फिर देश पर कुर्बान हो सकें। ये शौर्य और सहास की प्रतिमायें अपने आंसुओं का हिसाब मांगने चुनावी सभाओं में नहीं जातीं। जब कैप्टन सौरव कालिया जब शहीद हुये उसके बाद रक्षा बन्धन का त्यौहार आया, तब भी करगिल की लड़ाई चल रह...