‘एक समय की बात है। एक राजा था..’ इस तरह की कहानियां हम सभी बचपन से सुनते आ रहे हैं। लेकिन मुझे नहीं लगता हममें से किसी ने भी ऐसी कहानियां सुनी होंगी, जिनकी शुरुआत इस तरह होती हो : ‘एक समय की बात है। एक लोकतंत्र था। जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि चुनावी प्रक्रिया, अदालतों और लोकपाल के मार्फत जनता के प्रति उत्तरदायी थे।’ हम सभी पहली पंक्ति से बखूबी वाकिफ हैं, लेकिन दूसरी पंक्ति के बारे में हम ज्यादा नहीं जानते। लोकपाल बिल लागू करने में आ रही समस्याएं भी इसी में निहित हैं। हम यह तो जानते ही हैं कि हमारे मौजूदा सिस्टम में कहीं कुछ गड़बड़ है। इसके बावजूद बदलाव हमें असहज कर देता है। अन्ना के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरुद्ध चलाए गए आंदोलन में हम एकजुट हुए और आंदोलन को सफल बनाया। लेकिन जब हम भ्रष्टाचाररोधी लोकपाल बिल का मसौदा बनाने बैठे तो अंतर्विरोध सामने आने लगे। ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों पर निजी टिप्पणियां की गईं, दुर्गति के अंदेशे लगाए जाने लगे और यह भी कहा गया कि स्वयं लोकपाल भी तो भ्रष्ट हो सकता है। कुछ बुद्धिजीवियों ने इस आंदोलन को लोकतंत्र पर एक आक्रमण बताया। नागरिकों के असु...