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ग़ज़ल बहुत हैं मन में लेकिन फिर भी कम -संजीव 'सलिल'

ग़ज़ल संजीव 'सलिल' बहुत हैं मन में लेकिन फिर भी कम अरमान हैं प्यारे. पुरोहित हौसले हैं मंजिलें जजमान हैं प्यारे.. लिये हम आरसी को आरसी में आरसी देखें. हमें यह लग रहा है खुद से ही अनजान हैं प्यारे.. तुम्हारे नेह के नाते न कोई तोड़ पायेगा. दिले-नादां को लगते हिटलरी फरमान हैं प्यारे.. छुरों ने पीठ को घायल किया जब भी तभी देखा- 'सलिल' पर दोस्तों के अनगिनत अहसान हैं प्यारे.. जो दाना होने का दावा रहा करता हमेशा से. 'सलिल' से ज्यादा कोई भी नहीं नादान है प्यारे.. ********************************

बासंती दोहा ग़ज़ल -संजीव 'सलिल'

बासंती दोहा ग़ज़ल संजीव 'सलिल' स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित हैं कचनार. किंशुक कुसुम विहंस रहे या दहके अंगार.. पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार. पवन खो रहा होश है, लख वनश्री श्रृंगार.. महुआ महका देखकर, बहका-चहका प्यार. मधुशाला में बिन पिए' सर पर नशा सवार.. नहीं निशाना चूकती, पञ्च शरों की मार. पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार.. नैन मिले लड़ झुक उठे, करने को इंकार. देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार.. मैं तुम यह वह ही नहीं, बौराया संसार. ऋतु बसंत में मन करे, मिल में गले, खुमार.. ढोलक टिमकी मंजीरा, करें ठुमक इसरार. तकरारों को भूलकर, नाचो गाओ यार.. घर आँगन तन धो लिया, सचमुच रूप निखार. अपने मन का मेल भी, हँसकर 'सलिल' बुहार.. बासंती दोहा ग़ज़ल, मन्मथ की मनुहार. सूरत-सीरत रख 'सलिल', निएमल-विमल सँवार.. ************************************ दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

गीतिका: तितलियाँ --संजीव 'सलिल'

गीतिका तितलियाँ संजीव 'सलिल' * यादों की बारात तितलियाँ. कुदरत की सौगात तितलियाँ.. बिरले जिनके कद्रदान हैं. दर्द भरे नग्मात तितलियाँ.. नाच रहीं हैं ये बिटियों सी शोख-जवां ज़ज्बात तितलियाँ.. बद से बदतर होते जाते. जो, हैं वे हालात तितलियाँ.. कली-कली का रस लेती पर करें न धोखा-घात तितलियाँ.. हिल-मिल रहतीं नहीं जानतीं क्या हैं शाह औ' मात तितलियाँ.. 'सलिल' भरोसा कर ले इन पर हुईं न आदम-जात तितलियाँ.. ********************************* Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com

गीतिका: तुमने कब चाहा दिल दरके? --संजीव वर्मा 'सलिल'

गीतिका संजीव वर्मा 'सलिल' * तुमने कब चाहा दिल दरके? हुए दिवाने जब दिल-दर के। जिन पर हमने किया भरोसा वे निकले सौदाई जर के.. राज अक्ल का नहीं यहाँ पर ताज हुए हैं आशिक सर के। नाम न चाहें काम करें चुप वे ही जिंदा रहते मर के। परवाजों को कौन नापता? मुन्सिफ हैं सौदाई पर के। चाँद सी सूरत घूँघट बादल तृप्ति मिले जब आँचल सरके. 'सलिल' दर्द सह लेता हँसकर सहन न होते अँसुआ ढरके। **********************