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घड़ी कमर में लटकाऊंगा.. मैं गांधी बन जाऊं..

बचपन में पाठ्य पुस्तक में एक कविता पढ़ी थी, “मां खादी की चादर दे दे , मैं गांधी बन जाऊं।” कविता में एक बच्चा मां से गांधी जी के जैसी वस्तुएं दिलवाने की मनुहार करता है ताकि वह भी उन्हें लेकर गांधी जी जैसा दिख सके। उसमें गांधी जी की मशहूर घड़ी का जिक्र था। गांधी जी घड़ी हाथ में नहीं बांधते थे, कमर में लटकाते थे। “घड़ी कमर में लटकाऊंगा…” तब बाल मन के लिए गांधी जी आदर्श थे, उनकी तरह कमर में घड़ी बांधने की उत्सुकता होती थी। आज वही घड़ी तस्वीर में देखने को मिल रही है क्योंकि उसकी अमेरिका में नीलामी हुई है। क्या आपको वह पूरी कविता और लेखक का नाम याद है?कविता कुछ इस प्रकार थी:- मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊंसब मित्रों के बीच बैठ कर रघुपति राघव गांऊ घड़ी कमर में लटकाऊंगा सैर सवेरे कर आऊंगा मुझे रुई की पोनी दे दे तकली खूब चलाऊं मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं आगे पढ़ें के आगे यहाँ

कलम का सिपाही प्रतियोगिता के नतीजे घोषित!

''हिन्दुस्तान का दर्द'' ब्लॉग ने हिन्दी को बढावा देने के उद्देश्य एवं आप सभी कवि मित्रों को मिलाने की मंशा को लेकर ''कलम का सिपाही'' प्रतियोगिता का आयोजन किया था, इस दिशा में आप लोगों के सहयोग से हमे बहुत हद तक सफलता भी मिली ! इस प्रतियोगिता के अंतर्गत एक विजेता को १००० रुपए के नगद इनाम से सम्मानित किया जाना था इसी लिए हम इस प्रतियोगिता के विजेता की घोषणाकर रहे है! विजेता के चुनाव को करते समय सभी प्रकार की बातों पर ध्यान दिया गया है, इस जांच समिति में मुख्य रूप से युवा शक्ति संगठन शामिल रहा है ! इसलिए विजेता का चुनाव भी युवा शक्ति संगठन प्रमुख के निर्देश पर हुआ है! ''कलम का सिपाही'' प्रतियोगिता में ३० कवियों ने भाग लिया जिनका हम तहे- दिल से शुक्रिया अदा करते है बह सभी ३० कवि हैं :- १.रजनी मौर्य -माँ की बात २.प्रशांत देसाई- सर्द रात ३.अपूर्व जैन -देश को हुआ क्या है ? ४.विनय बिहारी सिंह-आम आदमी ५.मंजुलता जोशी- रोटी की कमी ६. अभिदीप यादव-हिंदू है हम ७.रोहित- खो देना चाहती हूँ तुम्हें ८.अमित चौबे-राजनीति अजीब है ९.निरंजन सागर-गोबर की सुगंध १...